लखनऊ, गोमती नगर स्थित बाबू बनारसी दास बैडमिंटन ऐकेडमी में पूर्व मंत्री राकेश वर्मा की सुपुत्री तानिया वर्मा का विवाह समारोह पूरे वैभव और राजनीतिक ठाठ के साथ सम्पन्न हुआ।
युगल दंपति को आशीर्वाद दिए गए, बधाइयों के शब्द गूंजे और उज्ज्वल भविष्य की कामनाएँ की गईं।
इस समारोह में प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव समेत बाराबंकी ज़िले के धनवान, नेता ,बड़ी गाड़ियों वाले, सत्ता और साधनों से संपन्न नेता बड़ी संख्या में मौजूद रहे।
शादी भव्य थी।
व्यवस्था शानदार थी।
चेहरे चमक रहे थे।
लेकिन उसी चकाचौंध के बीच
एक सवाल था
जो मंच से नहीं पूछा गया—
पर बाराबंकी की मिट्टी पूछ रही थी।
जब शादी भी राजनीति का आईना बन जाए
यह किसी बेटी की शादी पर सवाल नहीं है।
यह सवाल है उस राजनीति पर
जो वोट तो गाँव से चाहती है
लेकिन अपनी खुशियाँ
शहर के एसी हॉल में मनाती है।
राकेश वर्मा का परिवार
बाराबंकी के कंपनी बाग क्षेत्र में रहता है।
पैतृक गाँव
सिरौली गौसपुर है।
और अबकी बार
रामनगर विधानसभा से चुनाव लड़ने की तमन्ना भी है।
यानी
राजनीति की ज़मीन
आज भी गाँव ही है।
फिर सवाल स्वाभाविक है—
जब राजनीति गाँव से बनेगी,
तो रिश्ते शहर में क्यों पनपेंगे?
एक मूर्ति, जो आज भी सवाल पूछती है
उसी रात
बाराबंकी में
मोहनलाल डिग्री कॉलेज परिसर में लगी
स्वर्गीय बेनी प्रसाद वर्मा की मूर्ति
खामोशी से खड़ी थी।
पत्थर की मूर्ति…
लेकिन शायद सबसे ज़्यादा जीवित।
मानो पूछ रही हो—
“क्या मेरी पूरी राजनीति
सिर्फ पोस्टरों और भाषणों तक रह गई?”
जब बेनी बाबू ने बेटे की शादी बाराबंकी में की थी
बाराबंकी आज भी याद करता है
वो दिन
जब बेनी बाबू ने
अपने बेटे की शादी
यहीं,
इसी ज़मीन पर की थी।
उस शादी में
अमर सिंह आए थे,
मुलायम सिंह यादव,आज़म खान समेत कई हस्तियां,नेता आए थे—
और नेता होने से पहले
इंसान बनकर आए थे।
कोई प्रोटोकॉल नहीं,
कोई दिखावा नहीं।
गाँव के किसान थे,
गरीब थे,
यतीम थे—
और सबकी मौजूदगी
शादी की शान थी।
खटिया, खिचड़ी और सियासत की सादगी
बेनी प्रसाद वर्मा
वो नेता थे
जो गाँव की खटिया पर बैठते थे,
खिचड़ी खाते थे,
गन्ने का जूस पीते थे,
रसावल खाते थे।
वो
गरीब, यतीम, बीमार के सिर पर
हाथ रखकर
नेता कहलाते थे।
उनकी राजनीति
एसी हॉल में नहीं,
गाँव की धूप में पकती थी।
आज: दिखावा चर्चा में, परंपरा गुम
आज
बाराबंकी के गाँवों में चर्चा है—
“शादी तो शानदार थी,
पर गाँव में नहीं हुई।”
गाँव का गरीब,
किसान,
यतीम
उस दिन भी
उसी हाल में था
जैसे हर दिन रहता है।
न बुलावा,
न पहुँच,
न हिस्सेदारी।
उसकी दुआ
आज भी
शहर की दीवारों से टकराकर
लौट आई।
पाँच सितारा संस्कृति और दुआ की बेदखली
आज की राजनीति में
डेकोर ज़रूरी है,
दुआ वैकल्पिक।
जबकि
गाँव की राजनीति में
दुआ ही सबसे बड़ी पूँजी होती है।
जिस दिन
नेता
गरीब की दुआ को
“मैनेजमेंट इश्यू” समझ ले—
समझ लीजिए
विरासत वहीं खत्म हो जाती है।
विरासत जो मिटाई जा रही है
यह किसी शादी के ख़िलाफ़ नहीं है।
यह
एक विरासत के टूटने का और गरीब के दिल की आवाज है।
वो विरासत
जो बेनी प्रसाद वर्मा ने
गाँव, जमीन और गरीब से जोड़कर बनाई थी—
आज
लखनऊ की चमक में
धीरे-धीरे मिटाई जा रही है।
गाँव का गरीब
आज भी
नेता की दहलीज़ पर
दुआ लेकर खड़ा है।
सवाल सिर्फ इतना है—
क्या नेता
आज भी
उस दहलीज़ तक
लौटने को तैयार है?
क्योंकि—
“बेनी बाबू ने जिस मिट्टी को माथे से लगाया था,
आज उसी मिट्टी से नज़रें चुराई जा रही हैं।
याद रखिए—
जो नेता अपनी खुशियाँ गाँव से दूर मनाने लगे,
एक दिन वही गाँव
उसकी राजनीति से भी दूरी बना लेता है।”
“वोट से सत्ता मिल सकती है,
लेकिन
गरीब की दुआ खो दी गई
तो विरासत सिर्फ नाम बनकर रह जाती है।”
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