तहलका डेस्क/सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा
जिस इज़राइल ने दुनिया भर में जुल्म, खून और फ़साद का कारोबार फैलाया — आज वही मुल्क ज़मीन से लेकर आसमान तक जहन्नुम की आग में झुलस रहा है। यह आग महज़ जंगलों की नहीं, बल्कि बरसों से मज़लूमों की आह और खून की पुकार का नतीजा है, जिसने अब खुद को 'अजेय' समझने वाले एक नकली मुल्क को उसकी औक़ात दिखा दी है।
भारत को अस्थिर करने वाली इज़राइली सोच
इज़राइल ने हथियारों से सिर्फ अरबों को नहीं मारा, बल्कि दिमागों से भारत जैसे शांत देश में भी ज़हर घोला। इसके निशाने पर हमेशा वो विचार रहा जो भाईचारे, संविधान, और मज़हबी तालीम का था।
CAA, NRC, और दंगे:
इन विवादित क़ानूनों के पीछे जो डाटा इंजीनियरिंग, सोशल मीडिया भड़काव और नफरत फैलाने की स्क्रिप्ट तैयार की गई—उसमें इज़राइली साइकोलॉजिकल ऑपरेशन्स और मीडिया रणनीति की झलक साफ़ दिखती है।
कृषि कानून और किसान आंदोलन:
इज़राइल की बड़ी एग्रो-टेक कंपनियां और उनका भारत में लॉबिंग—इसी का नतीजा था कि अन्नदाता को सड़कों पर महीनों बैठना पड़ा।
जनरल बिपिन रावत की मौत:
देश के पहले CDS की हेलीकॉप्टर क्रैश आज भी रहस्य है। जब दुनिया की सबसे आधुनिक डिफेंस टेक भारत में इज़राइल सप्लाई करता है, तो सुरक्षा चूक पर शक गहराना स्वाभाविक है।
वक्फ़ बोर्डों पर हमला:
भारत में वक्फ़ संपत्तियों को कब्ज़े और सरकार के हवाले कराने की जो साज़िश चली, वो भी उसी वैश्विक परियोजना का हिस्सा थी जिसमें मुस्लिम पहचान को मिटाने की योजना थी।
पहलगाम हमला और मीडिया नैरेटिव:
आतंकी घटनाओं को घुमा-फिराकर एक मज़हब विशेष से जोड़ने की इज़राइली ट्रेनिंग ने भारत में भी पत्रकारिता का गला घोंट दिया।
अब वही इज़राइल जल रहा है
आज जब इज़राइल खुद को बचाने के लिए फ्रांस, इटली, तुर्किये और अमेरिका से भीख मांग रहा है, तो ये देखना एक इबरत है दुनिया के हर जालिम के लिए।
- 80,000+ लोग पलायन पर मजबूर
- 84,000 एकड़ ज़मीन राख
- पूरे यरुशलम और हाइफा में अफ़रातफरी
- दर्जनों शहर खाली
- इज़राइली एयरफोर्स बेबस
- सरकार आपातकाल में झूलती
जिन्होंने आँसू बेचे थे, आज पसीना भी नहीं बचा
इज़राइल की बर्बादी की ये आग बस जंगल की नहीं—यह उन बिलखती मांओं की बददुआओं की लपट है जो गाज़ा, यमन, कश्मीर और सीरिया में अपने बच्चों को गोद में शहीद देख चुकी हैं।
नेतन्याहू की आंखों में अब न सपना है, न साहस। अमेरिका की मदद अब सिर्फ "प्रेस रिलीज़" तक सीमित है, क्योंकि खुद अमेरिका आज अपने भीतर सुलग रहा है।
इबराहिमी उम्मत की सिसकियों का हिसाब
हर मज़लूम अब ये कह सकता है कि—
"तेरी मिसाइलें, तेरे ड्रोन, तेरे जंगी जहाज़
अब न रोक पाएंगे उस अल्लाह की लपट को
जो एक मज़लूम की आह से उठती है"
नतीजा साफ है: जुल्म हमेशा के लिए नहीं होता
जो लोग भारत, फिलस्तीन, लेबनान, और सीरिया ईरान में खून की नदियाँ बहा कर खुद को खुदा समझ बैठे थे, उन्हें अब समझ आ रहा है कि इंसाफ़ का सिस्टम धरती पर भी चलता है।
ये आग सिर्फ इज़राइल के लिए नहीं, हर उस ताकत के लिए पैग़ाम है जो मज़लूमों का खून बहाकर अपनी सल्तनतें खड़ी करना चाहती है।
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