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मूर्ति अनावरण से नहीं, ठंड में गरीबों को मिले कंबलों और उठी दुआओं से स्व. रामचन्द्र बख्श सिंह की आत्मा को मिली सच्ची शांति, जहाँ स्मारक से पहले सेवा आई, वहाँ राजनीति नहीं—इंसानियत अमर हुई।

तहलका टुडे टीम/सदाचारी लाला उमेश चंद्र श्रीवास्तव /मोहम्मद वसीक 

बाराबंकी, 01 फ़रवरी 2026।
इतिहास अक्सर भाषणों से नहीं, ख़ामोश दुआओं से लिखा जाता है। ग्राम देवरा, ब्लॉक निंदूरा (कुर्सी) में  आज जो हुआ, वह एक राजनीतिक कार्यक्रम से कहीं आगे था—वह एक एहसास था, एक रूहानी मंजर, जहाँ पत्थर की मूर्ति से ज़्यादा मायने उन कंबलों ने रखे, जो ठिठुरते बदन पर डाले गए।

सर्द हवा चल रही थी। मंच सजा था। आदमकद प्रतिमा से पर्दा हटाया गया। तालियाँ बजीं।
लेकिन असली आवाज़ उन काँपते हाथों की थी, जो कंबल पाकर बेआवाज़ दुआ के लिए उठे—और शायद उसी पल किसी जननायक की आत्मा को सुकून मिल गया।

जननायक, लोकप्रिय पूर्व विधायक/पूर्व एमएलसी स्वर्गीय बाबू रामचंद्र बख्श सिंह—जिनका जीवन सत्ता से नहीं, संघर्ष से पहचाना गया—उनकी स्मृति में आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता समाजवादी पार्टी के जिला अध्यक्ष हाफिज अयाज अहमद ने की। मुख्य अतिथि के रूप में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री अरविंद कुमार सिंह गोप मौजूद रहे।

 विशिष्ट अतिथि पूर्व मंत्री राकेश कुमार वर्मा ,विधायक गौरव रावत ,पूर्व एमएलसी राजेश यादव राजू , पूर्व विधायक राम गोपाल रावत ,चेयरमैन शीला सिंह वर्मा , पूर्व विधायक रतन लाल राव  की उपस्थित  में  पूर्व मंत्री अरविंद सिंह गोप ने अपने संबोधन में कहा कि बाबू रामचंद्र बख्श सिंह उस दौर के नेता थे, जब राजनीति का मतलब जनता की चौखट तक जाना होता था। तीन बार विधायक और एक बार एमएलसी रहने के बावजूद उन्होंने कभी आम आदमी से दूरी नहीं बनाई। गरीब, मजलूम और पीड़ित के लिए वे सत्ता नहीं, सहारा बनते थे। यही वजह है कि वे आज भी लोगों की यादों में ज़िंदा हैं—बिना शोर, बिना प्रचार।

कार्यक्रम के आयोजक एवं स्वर्गीय नेता के सुपुत्र, समाजवादी पार्टी के जिला उपाध्यक्ष अजय वर्मा ‘बबलू’ के लिए यह पल निजी भी था और सार्वजनिक भी। भावुक शब्दों में उन्होंने कहा कि पिता की जगह कोई नहीं ले सकता। उनकी याद में किया गया यह आयोजन एक छोटा सा प्रयास है—लेकिन अगर इससे किसी गरीब की ठंड कम हुई, तो यही उनकी सच्ची श्रद्धांजलि है।
उन्होंने विशेष रूप से अरविंद सिंह गोप का आभार जताया, जिन्होंने अपने संसाधनों से मूर्ति निर्माण और स्थापना कराई।

पूर्व मंत्री राकेश कुमार वर्मा ने कहा कि बाबू रामचंद्र बख्श सिंह के किए गए कार्य आज भी जनता की स्मृति में जीवित हैं। 

विधायक गौरव रावत ने कहा कि कुछ लोग कुर्सी छोड़ जाते हैं, लेकिन अपनी कार्यशैली छोड़ जाते हैं—और वही विरासत बन जाती है।

अतिथियों का सम्मान हुआ, अंगवस्त्र भेंट किए गए, भोजन की व्यवस्था की गई। अरविंद सिंह गोप को परिवार की ओर से चांदी का मुकुट पहनाकर सम्मानित किया गया। मंच पर नेता थे, नीचे कार्यकर्ता थे, चारों ओर ग्रामीण थे—लेकिन सबसे अहम मौजूदगी उन गरीबों की थी, जिनके चेहरे पर कंबल की गर्माहट से राहत की मुस्कान थी।

क्योंकि सच यही है—
मूर्ति लगाना यादगार हो सकता है,
भीड़ जुटाना राजनीति हो सकती है,
लेकिन ठंड से काँपते इंसान को कंबल देना—
वही वह अमल है, जो किसी खिदमतगार की आत्मा को सुकून देता है।

देवरा की उस सर्द शाम में, दुआओं की गर्माहट के बीच, ऐसा महसूस हुआ मानो स्वर्गीय बाबू रामचंद्र बख्श सिंह की रूह कह रही हो—

“मेरी पहचान मेरी मूर्ति नहीं,
मेरी पहचान वो हाथ हैं—
जो आज किसी गरीब की मदद के लिए उठे और वो मिलने वाली दुआ है।”


कार्यक्रम में मुख्य रूप से उपस्थित होने वाले लोगों में पूर्व एमएलसी अरविंद यादव,पूर्व प्रमुख सुरेन्द्र सिंह वर्मा,पूर्व अध्यक्ष डॉ कुलदीप सिंह,फ़ैज़ान किदवई, पंडित राजनाथ शर्मा जी,अविरल सिंह,पूर्व प्रमुख विवेकानंद पाण्डेय,पूर्व प्रमुख तालिब नज़ीब कोकब,संतोष वर्मा,हाफिज भारती,पूर्व विधायक राजलक्ष्मी वर्मा,कुसुम लता रावत,बार अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह वर्मा,हशमत अली गुड्डू,लल्लन वर्मा,तारिक किदवई,हुमायूं नईम खान,संजय सिंह,चौधरी अदनान,रेहान कामिल जी ,राजा अविनाश सिंह, फारुक अय्यूब एडवोकेट,मनोज सिंह,चेयरमैन इरशाद कमर साहब,ज्ञान सिंह यादव,मतीन खान,नसीम कीर्ति,विजय कुमार यादव,ताज बाबा राईन,तारिक जिलानी,विनय पांडेय,इंतिखाब आलम नोमानी,राजेश वर्मा,विकास यादव सरताज चौधरी,गुलरेज खान ,यशवंत यादव,आशीष सिंह आर्यन,कामता यादव,आकाश यादव,सुरेश यादव,पप्पू सिंह,सुरेन्द्र विक्रम सिंह, नफीस सिद्दीकी,डा आई के वर्मा,आदि सैकड़ों लोग उपस्थित रहे।

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