तहलका टुडे टीम/अली मुस्तफा
बाराबंकी | जिले के रफी अहमद किदवई स्मारक जिला अस्पताल से जुड़ा एक पर्चा सोशल मीडिया पर वायरल कर जिस तरह वरिष्ठ और अनुभवी चिकित्सक डॉ. राजेश कुशवाहा (एम.डी. मेडिसिन) की कार्यशैली और लिखावट पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं, उसे अब एक मेडिसिन माफियाओं की सुनियोजित दुष्प्रचार के तौर पर देखा जा रहा है।
🔎 मामला क्या है?
9 अप्रैल 2026 के एक ओपीडी पर्चे को वायरल कर यह दिखाने की कोशिश की गई कि डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवाएं अस्पष्ट हैं। लेकिन हकीकत इससे कहीं अलग नजर आती है।
अस्पताल के अंदरूनी सूत्रों और मरीजों का कहना है कि:
👉 सरकारी पर्चे पर लिखी गई दवाएं सीधे अस्पताल के स्टोर से मिलती हैं
👉 दवा वितरण करने वाली टीम डॉक्टर की लिखावट और दवा कोड को भली-भांति समझती है।
👉 हर दवा का पूरा रिकॉर्ड सिस्टम में दर्ज होता है
ऐसे में “लिखावट” को मुद्दा बनाना सिर्फ भ्रम फैलाने जैसा है।
🏥 ईमानदारी की पहचान हैं डॉ. कुशवाहा
डॉ. राजेश कुशवाहा को अस्पताल में एक ऐसे चिकित्सक के रूप में जाना जाता है—
- जो मरीजों से बेहद मधुर और संवेदनशील व्यवहार रखते हैं
- जो प्राइवेट मेडिकल स्टोर और एमआर नेटवर्क से दूरी बनाए रखते हैं
- जो सरकारी व्यवस्था के तहत मुफ्त दवा उपलब्ध कराने पर जोर देते हैं
आज जब चिकित्सा क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा “कमाई की नीति” पर चलता दिखाई देता है, ऐसे में उनकी सादगी और ईमानदारी कई लोगों के हितों के खिलाफ जाती है।
⚠️ मेडिकल माफिया की नाराजगी?
सूत्र बताते हैं कि अस्पताल के भीतर सक्रिय कुछ दलाल और कमीशनखोर नेटवर्क लंबे समय से डॉक्टर कुशवाहा की कार्यशैली से असहज हैं।
क्योंकि—
❌ उनके रहते निजी दवाओं की बिक्री कम होती है
❌ कमीशन आधारित सिस्टम ठप पड़ जाता है
ऐसे में अब उनकी छवि खराब करने के लिए “लिखावट” जैसे मामूली मुद्दे को उछाला जा रहा है।
🧾 मरीज पत्रकार का अनुभव: जिंदगी बचाने वाले डॉक्टर
वरिष्ठ पत्रकार सदाचारी लाला उमेश चंद्र श्रीवास्तव बताते हैं:
“तीन साल पहले मुझे डेंगू हुआ था, हालत बेहद गंभीर थी। प्लेटलेट्स बहुत कम हो गई थीं। कई डॉक्टरों ने जवाब दे दिया और लखनऊ रेफर कर दिया गया। उसी समय डॉ. राजेश कुशवाहा ने जिम्मेदारी ली और कहा—‘घबराइए नहीं, हम ठीक कर देंगे।’
उनके इलाज और ईश्वर की कृपा से मैं पूरी तरह स्वस्थ हो गया।”
उनका कहना है कि ऐसे जीवनदाता डॉक्टर के खिलाफ इस तरह का दुष्प्रचार बेहद निंदनीय है।
📢 सोशल मीडिया बनाम सच्चाई
सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने इस पर्चे को “ईसीजी लाइन” कहकर मजाक बनाया, लेकिन सवाल यह है कि—
👉 क्या सिर्फ लिखावट के आधार पर किसी डॉक्टर की नीयत और सेवा भावना पर सवाल उठाना सही है?
👉 क्या यह एक बड़े गिरोह द्वारा रची गई छवि खराब करने की रणनीति नहीं?
🛑 सख्त शब्दों में निंदा
इस पूरे मामले में साफ तौर पर दिखता है कि—
एक ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ डॉक्टर को बदनाम करने के लिए सुनियोजित अभियान चलाया जा रहा है।
ऐसी हरकतें न केवल एक व्यक्ति की प्रतिष्ठा पर हमला हैं, बल्कि पूरी सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश भी
“पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए,
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए…”
सवाल उठाने चाहिए—लेकिन सच के साथ।
और जब सच यह हो कि एक डॉक्टर अपनी ईमानदारी से सिस्टम को साफ रखने की कोशिश कर रहा है,
तो उसके खिलाफ फैलाए जा रहे झूठ का डटकर विरोध भी होना चाहिए।
अब जरूरत है कि प्रशासन इस दुष्प्रचार की जांच करे और ऐसे तत्वों पर कार्रवाई करे जो अपने स्वार्थ के लिए जनसेवा में लगे लोगों की छवि खराब कर रहे हैं।
0 Comments