रिपोर्ट: सदाचारी लाला उमेश चंद्र श्रीवास्तव/मोहम्मद वसीक
बाराबंकी। शहर में दो तरह के लोग रहते हैं। एक वे, जो दिनभर मेहनत करके शाम को अपने बच्चों के लिए रोटी लेकर घर लौटते हैं। दूसरे वे, जिनकी सबसे बड़ी चिंता यह होती है कि उनकी गाड़ी का हूटर कितनी दूर तक सुनाई दे, काले शीशों से लोग कितना प्रभावित हों और मॉडिफाइड साइलेंसर की आवाज़ से कितनी गर्दनें उनकी ओर मुड़ें।
किसी के घर में चूल्हा ठंडा है, किसी की माँ दवा के इंतज़ार में बैठी है, कोई पिता बेटे की फीस जोड़ने में लगा है, मगर शहर की कुछ सड़कों पर ऐसे भी लोग हैं जिनकी दुनिया सिर्फ दिखावे की चमक तक सिमट गई है। उन्हें न भूखों की चिंता है, न प्यासों की। बस यह चिंता है कि लोग उन्हें देखकर प्रभावित हों।
लेकिन सोमवार का दिन उनके लिए अलग था।
व्यस्त चौराहों पर इस बार तमाशा देखने वाली भीड़ नहीं, कानून खड़ा था। पुलिस कप्तान अर्पित विजय वर्गीय के निर्देश पर यातायात प्रभारी राम यतन यादव अपनी टीम के साथ सड़क पर उतरे तो अवैध हूटरों की अकड़, काले शीशों का गुरूर और मॉडिफाइड साइलेंसरों का शोर कुछ ही देर में शांत हो गया।
जिस हूटर की आवाज़ से लोग खुद को वीआईपी समझते थे, वह चालान की रसीद के आगे बेबस दिखाई दिया। जिन काले शीशों के पीछे बैठकर कुछ लोग कानून से ऊपर होने का भ्रम पाल बैठे थे, वे शीशे भी नियमों की रोशनी में पारदर्शी हो गए। जो साइलेंसर शहर की फिज़ा को शोर से भर रहे थे, उनकी दहाड़ भी कानून की सख्ती के सामने खामोश पड़ गई।
अभियान के दौरान काले शीशे, अवैध हूटर, मॉडिफाइड साइलेंसर और अन्य यातायात नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहनों की गहन जांच की गई। नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ तत्काल चालान की कार्रवाई की गई और उन्हें स्पष्ट चेतावनी दी गई कि भविष्य में ऐसी लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
यातायात प्रभारी राम यतन यादव ने कहा कि सड़क सुरक्षा किसी व्यक्ति की शान या दिखावे से बड़ी है। कानून सबके लिए समान है और यातायात नियमों की अनदेखी करने वालों के खिलाफ यह अभियान आगे भी लगातार जारी रहेगा। उन्होंने नागरिकों से अपील की कि वे अपने वाहनों में अवैध संशोधन न कराएं और जिम्मेदार नागरिक होने का परिचय दें।
यह अभियान केवल चालान काटने का नहीं था, बल्कि उस मानसिकता को आईना दिखाने का प्रयास था, जिसमें कुछ लोग शोर को शान और नियम तोड़ने को रुतबा समझ बैठते हैं।
आख़िर शहर की पहचान हूटर की आवाज़ से नहीं होती, बल्कि उन लोगों से होती है जो कानून का सम्मान करते हैं। जिस दिन दिखावे से ज़्यादा इंसानियत और अनुशासन की कीमत समझ में आ जाएगी, उस दिन सड़कों पर शोर कम और सुकून ज़्यादा दिखाई देगा।
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