तहलका टुडे टीम/मनोज शुक्ला
बाराबंकी।पुराने शहरों की मिट्टी अजीब होती है। वह बोलती नहीं, लेकिन सब याद रखती है। किसने उसकी हिफाज़त की, किसने उसकी तरफ़ पीठ फेर ली, किसने उसकी विरासत को बचाया और किसने उसे वक्त के हवाले छोड़ दिया—धरती सबका हिसाब अपने सीने में लिखती रहती है।
बाराबंकी की धरती भी बरसों से ऐसे ही सवाल अपने भीतर दबाए बैठी है।
कब्रिस्तानों की दीवारें बूढ़ी हो चुकी हैं। करबला की मिट्टी आज भी अपने असली वारिसों को पुकारती है। औकाफ़ की कई ज़मीनें वर्षों से विवादों और कथित अतिक्रमण की कहानियाँ सुनाती हैं। दस्तावेज़ सरकारी अलमारियों में पड़े-पड़े पीले हो गए, लेकिन उन पर जमी धूल झाड़ने वाला कोई नहीं आया।
लोग कहते हैं कि जनपद में हजारों वक्फ़ संपत्तियाँ अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। सवाल उठते रहे, शिकायतें होती रहीं, ज्ञापन दिए जाते रहे, मगर राजनीतिक मंचों पर इस दर्द की गूँज बहुत कम सुनाई दी।
बाराबंकी की राजनीतिक स्मृतियों में एक और घटना दर्ज है। समाजवादी पार्टी के शासनकाल में तत्कालीन मंत्री आज़म ख़ान का हेलीकॉप्टर, जिसमें उस समय का गुनाह उत्तर प्रदेश शिया वक्फ़ बोर्ड के तत्कालीन अध्यक्ष वसीम रिज़वी भी साथ था, बाराबंकी में गिरा था। उस घटना को आज भी लोग याद करते हैं। लेकिन आलोचक यह सवाल भी उठाते हैं कि जिस ज़मीन पर उस दिन पूरा गुनाह लिए गिरा था, उसी ज़िले में वक्फ़ संपत्तियों से जुड़े विवादों और कथित अतिक्रमणों पर उतनी राजनीतिक सक्रियता क्यों दिखाई नहीं दी।
समय बदला।
और अब वही समाजवादी पार्टी मौलाना मोहम्मद जौहर अली यूनिवर्सिटी के 38 ब्लॉकों को तोड़े जाने के सरकारी नोटिस के विरोध में पूरी ताक़त से खड़ी दिखाई दे रही है।
संविधान-मानस्तंभ के दूसरे स्थापना दिवस पर जिला समाजवादी पार्टी कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रीय सचिव एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री अरविंद कुमार सिंह गोप ने कहा कि संविधान देश के प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की गारंटी है। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर रही है और यदि जौहर यूनिवर्सिटी पर कार्रवाई हुई तो समाजवादी पार्टी बड़ा आंदोलन करेगी।
उन्होंने कार्यकर्ताओं से 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटने का आह्वान करते हुए कहा कि किसानों, छात्रों, गरीबों और वंचितों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रहेगा।
पूर्व कैबिनेट मंत्री राकेश वर्मा ने कहा कि समाजवादी सरकारों ने संविधान की भावना के अनुरूप कार्य किया, जबकि वर्तमान सरकार शिक्षा और सामाजिक अधिकारों को कमजोर कर रही है।
सदर विधायक धर्मराज सिंह उर्फ़ सुरेश यादव ने प्राथमिक विद्यालयों के बंद होने पर चिंता व्यक्त की। जैदपुर विधायक गौरव रावत ने संविधान की रक्षा के लिए समाज को एकजुट रहने की बात कही। जिलाध्यक्ष हाफिज़ अयाज़ अहमद ने संविधान को लोकतंत्र की सबसे बड़ी ढाल बताते हुए उसकी रक्षा का संकल्प दोहराया।
सभा समाप्त हुई। तालियाँ थम गईं। कुर्सियाँ खाली हो गईं। नेता अपने-अपने काफ़िलों के साथ लौट गए।
लेकिन बाराबंकी की हवा में एक सवाल अब भी तैरता रहा।
यदि संविधान हर नागरिक के अधिकारों की रक्षा करता है, तो क्या वक्फ़ की ज़मीनें संविधान के दायरे से बाहर हैं?
यदि जौहर यूनिवर्सिटी की दीवारों के लिए आंदोलन हो सकता है, तो क्या कब्रिस्तान, करबला और वर्षों से विवादों में घिरी वक्फ़ संपत्तियाँ आंदोलन के योग्य नहीं हैं?
राजनीति की विश्वसनीयता केवल भाषणों से नहीं बनती, बल्कि उस समान संवेदना से बनती है जो हर पीड़ित तक पहुँचे।
बाराबंकी आज यही पूछ रहा है—
जिस सरज़मीं पर कभी सत्ता का हेलीकॉप्टर गिरा था वक्फ के गुनाह गार के साथ, क्या उसी सरज़मीं पर बिखरती वक्फ़ की विरासत किसी आंदोलन की हक़दार नहीं थी?
शायद इतिहास का सबसे कठिन सवाल यही होता है कि नेता किसके लिए बोले, और किसकी ख़ामोशी को अपनी राजनीति का हिस्सा बना लिया।
और इतिहास का न्यायालय गवाहों से नहीं, समय की ख़ामोश ज़मीनों से फैसला लिखवाता है।
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