सदाचारी लाला उमेश चंद्र श्रीवास्तव/मोहम्मद वसीक
बाराबंकी/लखनऊ, 28 जुलाई 2026।
समय बदल रहा है। किताबों की जगह टैबलेट ने ले ली है, ब्लैकबोर्ड की जगह स्मार्ट स्क्रीन ने और अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) इंसानी दिमाग़ को चुनौती देती दिखाई दे रही है। लेकिन इस तेज़ रफ्तार विकास के बीच एक सवाल पहले से अधिक गंभीर होकर सामने खड़ा है—क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था केवल कुशल पेशेवर तैयार कर रही है, या बेहतर इंसान भी?
इसी सवाल के उत्तर की तलाश में श्री रामस्वरूप मेमोरियल विश्वविद्यालय (एसआरएमयू) ने एक ऐसी पहल शुरू की है, जो शिक्षा को केवल रोजगार नहीं, बल्कि जीवन का माध्यम मानती है। एआईसीटीई के समन्वयन में मंगलवार से शुरू हुआ तीन दिवसीय "यूनिवर्सल ह्यूमन वैल्यूज" फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम इस बात का संदेश देता है कि आधुनिक शिक्षा की सबसे बड़ी परीक्षा प्रयोगशालाओं में नहीं, बल्कि इंसान के चरित्र में होती है।
विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित उद्घाटन समारोह में कुलपति प्रो. (डॉ.) विजय तिवारी, कुलसचिव डॉ. हेमेन्द्र शर्मा, विभिन्न संकायों के डीन, निदेशक, विभागाध्यक्ष तथा बड़ी संख्या में शिक्षक उपस्थित रहे। वातावरण औपचारिक अवश्य था, लेकिन चर्चा का केंद्र पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि मनुष्य और उसके मूल्य थे।
"ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह इंसानियत से जुड़ जाए"
अपने उद्बोधन में कुलपति प्रो. (डॉ.) विजय तिवारी ने कहा कि विश्वविद्यालयों की सफलता केवल डिग्रियों या प्लेसमेंट से नहीं मापी जा सकती। वास्तविक सफलता तब है, जब यहां से निकलने वाला छात्र समाज के प्रति उत्तरदायी, संवेदनशील और नैतिक नागरिक बने।
उन्होंने कहा कि मानवीय मूल्यों से रहित शिक्षा केवल सूचना देती है, जबकि मूल्य आधारित शिक्षा व्यक्तित्व का निर्माण करती है। उनके अनुसार एआईसीटीई का यह कार्यक्रम शिक्षकों को ऐसा दृष्टिकोण देगा, जिससे वे विद्यार्थियों के भीतर ज्ञान के साथ-साथ जिम्मेदारी, करुणा और सामाजिक चेतना भी विकसित कर सकें।
तकनीक की रफ्तार तेज़ है, लेकिन रिश्तों की गर्माहट भी बची रहनी चाहिए
कार्यक्रम के विश्वविद्यालय समन्वयक प्रो. (डॉ.) कुलभूषण सिंह ने कहा कि आज विज्ञान और तकनीक अभूतपूर्व ऊँचाइयों पर हैं, लेकिन यदि शिक्षा से नैतिकता, सहयोग, सह-अस्तित्व और संवेदनशीलता जैसे मूल्य दूर हो गए, तो विकास अधूरा रह जाएगा।
उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल सफल करियर नहीं, बल्कि सफल जीवन की नींव रखना भी है। यही कारण है कि इस प्रशिक्षण में शिक्षकों को मूल्य-आधारित शिक्षण की ऐसी विधियाँ सिखाई जाएँगी, जो विद्यार्थियों के व्यक्तित्व को भीतर से मजबूत बनाएँ।
विशेषज्ञ देंगे जीवन और शिक्षा का नया दृष्टिकोण
कार्यक्रम में रिसोर्स पर्सन श्री आलोक कुमार पांडेय, को-फैसिलिटेटर डॉ. हेमलता जैन एवं श्री हिमांशु कुमार द्विवेदी, ऑब्जर्वर डॉ. नियति गर्ग, रीजनल कोऑर्डिनेटर्स डॉ. उपासना मिश्रा, प्रो. गौरव मिश्रा तथा डॉ. बी. एन. पांडेय अपनी विशेषज्ञता साझा कर रहे हैं।
कार्यक्रम के संचालन में प्रशिक्षित लोकल प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर्स श्री प्रभात कुमार और डॉ. रुचि सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
30 जुलाई तक चलने वाले इस प्रशिक्षण में शिक्षकों को मानव मूल्यों की अवधारणा, नैतिक निर्णय क्षमता, सामाजिक उत्तरदायित्व, सह-अस्तित्व, मूल्य आधारित शिक्षण पद्धति तथा सकारात्मक व्यक्तित्व निर्माण जैसे विषयों पर व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा।
तहलका टुडे के सैयद रिज़वान मुस्तफा कहते हैं असली चुनौती डिग्री नहीं, चरित्र है
आज देश के विश्वविद्यालय उत्कृष्ट प्लेसमेंट, आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक रैंकिंग की होड़ में हैं। यह आवश्यक भी है। लेकिन यदि शिक्षा केवल नौकरी दिलाने तक सीमित रह जाए और समाज को संवेदनशील नागरिक न दे सके, तो उसकी सफलता अधूरी मानी जाएगी।
एसआरएमयू की यह पहल इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि यह उस प्रश्न को केंद्र में लाती है, जिसे अक्सर शिक्षा की चमक-दमक में भुला दिया जाता है—क्या हम ज्ञानवान लोगों का समाज बना रहे हैं, या केवल डिग्रीधारियों का?
यदि इस प्रशिक्षण से निकले विचार कक्षाओं तक पहुँचते हैं, शिक्षक उन्हें अपने व्यवहार में उतारते हैं और विद्यार्थी उन्हें अपने जीवन का हिस्सा बनाते हैं, तो यह कार्यक्रम केवल एक कार्यशाला नहीं रहेगा, बल्कि उच्च शिक्षा में मूल्य आधारित परिवर्तन की एक महत्वपूर्ण शुरुआत सिद्ध हो सकता है।
क्योंकि इतिहास गवाह है—सभ्यताएँ तकनीक से शक्तिशाली बनीं, लेकिन इंसानियत से महान बनीं।
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