रिपोर्ट: सदाचारी लाला उमेश चंद्र श्रीवास्तव/मोहम्मद वसीक /तहलका टुडे टीम
बाराबंकी। कुछ लोग इस दुनिया में सिर्फ़ सांस लेने के लिए नहीं आते, बल्कि दूसरों के दर्द को अपना दर्द बनाकर जीते हैं। कुछ लोग अपने लिए घर बनाते हैं, और कुछ लोग ऐसे होते हैं जो टूटे हुए घरों तक आख़िरी सफ़र पहुंचाने का फर्ज़ निभाते हैं। बदरुल हक़ उर्फ़ “परदेसी भाई” भी उन्हीं ख़ामोश लेकिन बुलंद किरदारों में से एक थे, जिनका इंतिक़ाल ने पूरे बाराबंकी के लिए ग़म की खबर है।
आज सुबह जैसे ही यह खबर फैली कि परदेसी भाई अब इस दुनिया में नहीं रहे, हर दिल भर आया। कई महीनों से बीमार चल रहे परदेसी भाई ने आज सुबह दाय-ए-अजल को लब्बैक कहा और इस फ़ानी दुनिया से रुख़्सत हो गए। ज़ोहर की नमाज़ के बाद उन्हें बड़े मजमे के साथ सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया। लेकिन सच यह है कि आज सिर्फ़ एक इंसान नहीं दफ़्न हुआ, बल्कि बाराबंकी की इंसानियत का एक ज़िंदा बाब भी मिट्टी में उतर गया।
परदेसी भाई की पहचान सिर्फ़ एक नाम नहीं थी, बल्कि एक भरोसा, एक सहारा और एक इंसानी फ़र्ज़ थी। सड़क हादसे में किसी की मौत हो जाए, किसी अज्ञात शव की खबर मिले, किसी दर्दनाक घटना में खून से सनी लाश सड़क पर पड़ी हो, या किसी गरीब परिवार पर अचानक मातम टूट पड़ा हो— ऐसे हर मौके पर सबसे पहले अगर कोई पहुंचता था, तो वह परदेसी भाई होते थे। उन्होंने कभी यह नहीं देखा कि सामने हिंदू है या मुसलमान, अमीर है या गरीब, ऊंची जात का है या पिछड़े तबक़े से। उनके लिए बस एक ही बात मायने रखती थी—
“यह एक इंसान है, और इसे इज़्ज़त के साथ उसके घर पहुंचना चाहिए।”
आज के दौर में, जब इंसान छोटी-छोटी बातों में जात-पात, धर्म, बिरादरी और पहचान की दीवारें खड़ी कर देता है, तब परदेसी भाई उन गिने-चुने लोगों में थे जिन्होंने अपने अमल से यह साबित किया कि
इंसानियत का कोई मज़हब नहीं होता, लेकिन मज़हब की असल रूह इंसानियत ही होती है।
मौत का मंजर आसान नहीं होता। खून से सनी सड़क, टूटे हुए वाहन, रोते-बिलखते घर वाले और एक बेजान जिस्म— यह सब देखकर अच्छे-अच्छे लोगों के कदम डगमगा जाते हैं। कई बार ऐसा भी हुआ कि अपने रिश्तेदार तक खून से लथपथ शवों के पास जाने से डर गए, लेकिन उसी वक्त एक आदमी अपनी ठेलिया, अपने जज़्बे और अपने रहमदिल दिल के साथ आगे बढ़ा— और वह था “परदेसी भाई”। वह घटनास्थल से शव उठाते, पोस्टमार्टम हाउस तक पहुंचाते, कागज़ी कार्रवाई में मदद करते, और फिर पोस्टमार्टम के बाद लाश को परिवार या गांव तक पहुंचाने में हाथ बंटाते। अगर कोई लावारिस होता, तो उसके अंतिम संस्कार या सुपुर्द-ए-ख़ाक तक का इंतज़ाम भी करते।
यह सब उन्होंने कभी नौकरी नहीं समझा। यह उनके लिए खिदमत थी, इबादत थी और शायद अल्लाह से कुर्बत पाने का सबसे पाक रास्ता भी। न कोई सरकारी गाड़ी, न कोई बड़ा ओहदा, न कोई मंच, न कोई प्रचार— बस एक ठेलिया, कुछ थके मगर मजबूत हाथ, और एक ऐसा दिल, जो दूसरों के दर्द को अपना दर्द समझता था।
पोस्टमार्टम हाउस के बाहर रोती हुई मांओं, टूटे हुए बापों और बिखरे हुए परिवारों के बीच परदेसी भाई सिर्फ़ मददगार नहीं, बल्कि तसल्ली देने वाले इंसान भी थे। जब किसी मां की चीख़ें आसमान चीर रही होती थीं, तब वही शख़्स आगे बढ़कर कहता था—
“हिम्मत रखो… हम हैं न…”
यही जुमला कई घरों के लिए सहारा, सब्र और इंसानियत की आख़िरी रोशनी बन जाता था।
उनकी सबसे बड़ी खूबसूरती यह भी थी कि उन्होंने सिर्फ़ खुद यह रास्ता नहीं चुना, बल्कि अपने परिवार को भी इंसानियत की तालीम दी। उनके दो बेटे—इरशाद और अली— हमेशा अपने वालिद के शाना-ब-शाना इस नेक काम में खड़े रहे। आज यह परिवार सिर्फ़ अपने सरपरस्त से नहीं, बल्कि समाज के एक ऐसे सहारे से महरूम हुआ है जो बाराबंकी की इंसानियत का चेहरा बन चुका था।
आज सवाल सिर्फ़ शोक का नहीं, ज़िम्मेदारी का भी है।
जो आदमी बरसों तक हिंदू-मुसलमान देखे बिना, जात-पात की दीवारें तोड़कर, लावारिसों को भी इज़्ज़त देता रहा— क्या अब समाज, प्रशासन और जिम्मेदार लोग उसके परिवार के साथ खड़े होंगे?
क्योंकि कुछ लोग मरने के बाद सिर्फ़ याद नहीं किए जाते, उनकी खिदमत का हक़ भी अदा किया जाता है।
बदरुल हक़ उर्फ़ परदेसी भाई, आपने किसी मंच, किसी फोटो, किसी पद या किसी वाहवाही के लिए नहीं, बल्कि इंसानियत की लाज बचाने के लिए ज़िंदगी गुज़ारी।
आज आप हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन आपकी ठेलिया, आपकी खिदमत, आपकी आंखों की नमी और आपका ख़ामोश जज़्बा बाराबंकी की रूह में हमेशा जिंदा रहेगा।
ईश्वर मरहूम बदरुल हक़ उर्फ़ परदेसी भाई की मग़फ़िरत फरमाए, उनकी क़ब्र को नूर से भर दे और उनके अहल-ए-ख़ाना को सब्र-ए-जमील अता करे। आमीन।
0 Comments