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“जैदपुर की फिज़ा में गूंजा एहतिजाज: मज़लूमों की हिमायत और विश्व शांति के रहनुमा आयतुल्लाह सैयद अली ख़ामनेई की याद में नम आंखें, अकीदत के आंसू और ज़ुल्म के खिलाफ बुलंद होती आवाज़”


तहलका टुडे टीम

बाराबंकी की सरज़मीं अपनी गंगा-जमुनी तहज़ीब, अम्न-ओ-अमान और रूहानियत के लिए जानी जाती है। उसी ज़िले के ऐतिहासिक कस्बे ज़ैदपुर, जो मशहूर ईरानी क्रांति के नायक रहे इमाम खुमैनी के  पैतृक गांव किन्तूर से लगभग 25 मील की दूरी पर आबाद है, ने एक बार फिर अपनी संवेदनशीलता और दीनी गैरत का परिचय दिया।

अमेरिका और इज़राइल के हमले में शहीद बताये गए ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह सैयद अली हुसैनी ख़ामनेई की याद में वक्फ इमामबाड़ा गढ़ी जदीद तालुकदार, ज़ैदपुर में एक ताज़ियती जलसा और मजलिस-ए-अज़ा का आयोजन किया गया।

“शहादत जिनकी आरज़ू थी…”

जलसे में पढ़े गए इन अल्फ़ाज़ ने फिज़ा को ग़मगीन भी किया और हौसला भी दिया:

“शहादत जिनकी आरज़ू थी, जो न झुका, न डरा और न पीछे हटा — ज़माना उसे हमेशा याद रखेगा।
यज़ीद के खिलाफ़ लड़ाई में अपने उसूल के लिए शहीद हो जाना ही तो कर्बला का सबक था…”

मोमबत्तियों की रोशनी, हाथों में पोस्टर, और लबों पर शहीदों के हक़ में बुलंद नारों ने यह पैग़ाम दिया कि शहीद मरते नहीं, बल्कि लोगों के दिलों में सदियों तक ज़िंदा रहते हैं।

ज़ैदपुर की ऐतिहासिक विरासत

ज़ैदपुर केवल एक कस्बा नहीं, बल्कि इल्म, अदब और दीनी रवायतों की धरती रहा है। बाराबंकी ज़िला स्वयं सादात का मरकज़ सूफ़ियाना रंग, धार्मिक सह-अस्तित्व और तहज़ीबी मेलजोल के लिए पहचाना जाता है।

करीब ही स्थित ईरान के क्रांति के जनक इमाम खुमैनी का किन्तूर है, जहाँ हिन्दू और मुस्लिम विरासतें साथ-साथ सांस लेती हैं। यही गंगा-जमुनी संस्कृति ज़ैदपुर के मिज़ाज में भी नज़र आती है — जहाँ मजलिसें भी होती हैं और मेलों की रौनक भी।

ऐसे ऐतिहासिक कस्बे में आयोजित यह ताज़ियती जलसा केवल एक शोकसभा नहीं, बल्कि विचार और प्रतिरोध की आवाज़ बन गया।

“एक मर्दे-मुजाहिद की विरासत”

उलेमा-ए-किराम ने अपने ख़िताब में कहा कि आयतुल्लाह ख़ामनेई, आयतुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी के उत्तराधिकारी के रूप में न सिर्फ़ ईरान बल्कि पूरी उम्मते-मुस्लिमा के लिए एक प्रतीक रहे।

उन्होंने मज़लूमों की हिमायत, फ़िलिस्तीन के समर्थन और ज़ुल्म के खिलाफ़ बुलंद आवाज़ को अपनी पहचान बनाया। वक्ताओं ने कहा कि:

  • वे किसी एक समुदाय के नेता नहीं थे
  • वे हर उस शख़्स के दिल की आवाज़ थे जो अन्याय के खिलाफ़ खड़ा होता है
  • उनकी ज़िंदगी और विचारधारा आने वाली नस्लों के लिए सबक है

उलेमा और नौजवानों की बुलंद आवाज़

इस एहतेजाजी इजलास में मौलाना सैयद रज़ा मूसवी, मौलाना सैयद ज़हीन रिज़वी, मौलाना अबू तालिब, मौलाना सैयद बिज़ाअत हुसैन रिज़वी, मौलाना सैयद अता मेहंदी ज़ैदपुरी, मौलाना फ़ैज़ अब्बास मशहदी, मौलाना सैयद आलिम मेहदी ज़ैदपुरी और मोहम्मद आसिफ ज़ैदपुरी समेत अनेक वक्ताओं ने अपने विचार रखे।

उन्होंने ज़ुल्म के खिलाफ़ एकजुट होकर आवाज़ बुलंद करने का आह्वान किया।

जलसे में मक्की ज़ैदपुरी और सईद ज़ैदपुरी ने कलाम पेश कर ग़म का इज़हार किया, जबकि निज़ामत सैयद कामिल रिज़वी ज़ैदपुरी ने की।
मजलिस-ए-अज़ा को मौलाना फ़ैज़ अब्बास मशहदी ने ख़िताब फरमाया।

आंखों में नमी, लबों पर नारे

कार्यक्रम में रियाज़ अहमद, अबू उमैर अंसारी, फैज़ान अंसारी, जौहर रज़ा, हारून राईन, रज़ा रिज़वी, मौलाना इसराइल, मो. सालिम, जावेद रिज़वी, सगीर अंसारी, शैज़ी रिज़वी, मो. कौसर, समीर रिज़वी, अबान रिज़वी, हसन सज्जाद ज़ैदी (आर्ट), ज़ामिन रिज़वी समेत बड़ी संख्या में नौजवान और बुजुर्ग मौजूद रहे।

उनकी आंखों में आंसू थे, मगर आवाज़ में मज़बूती थी।
लबों पर नारा था — “ख़ामनेई ज़िंदाबाद”
और दिलों में यह यक़ीन कि विचार और उसूल कभी मरते नहीं।

बाराबंकी की सरज़मीं से उठी पुकार

बाराबंकी, शांति, कम अपराध दर और गंगा-जमुनी संस्कृति की पहचान की ज़मीन से यह संदेश गया कि अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना ही इंसाफ़ की पहली सीढ़ी है।

ज़ैदपुर का यह प्रोग्राम इतिहास के पन्नों में दर्ज रहेगा —
एक कस्बे की तहरीर के रूप में,
जहाँ रूहानियत ने सियासत से ऊपर उठकर
मज़लूमों के हक़ में अपनी गवाही पेश की।

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