सदाचारी लाला उमेश चंद्र श्रीवास्तव/ मोहम्मद वसीक
बाराबंकी की फ़िज़ा आज बोझिल है। हर गली, हर चौराहा जैसे किसी अपने के बिछड़ने का ग़म महसूस कर रहा है। पत्रकार अज़ीज़ अहमद ‘अज्जू’ के वालिद, हाजी मोहम्मद मुस्तफीज़ अहमद साहब अब इस दुनिया में नहीं रहे—मगर उनकी यादें, उनकी बातें और उनका अपनापन हर दिल में ज़िंदा है।
वो सिर्फ़ एक शख़्स नहीं थे, बल्कि एक एहसास थे—ऐसा एहसास जो मिलने वाले हर इंसान को अपना बना लेता था। उनकी सादगी में जो ख़ूबसूरती थी, वो आज के दौर में कम ही देखने को मिलती है। न कोई दिखावा, न कोई बनावट—बस एक साफ दिल और सच्चा लहजा।
उनके इंतकाल की खबर ने पूरे इलाके को मायूस कर दिया है। यह सिर्फ़ एक परिवार का नुकसान नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक बड़ी कमी है। ऐसे लोग बहुत कम होते हैं, जो बिना शोर किए लोगों के दिलों में अपनी जगह बना लेते हैं—हाजी साहब उन्हीं में से एक थे।
🕌 आख़िरी सफ़र की तैयारी:
मरहूम का जनाज़ा उनके पुराने घर रफ़ी नगर से उठेगा। नमाज़-ए-जनाज़ा आज सोमवार की रात 9 बजे बाराबंकी के क़दीमी क़मरियाबाग़ कब्रिस्तान में अदा की जाएगी, और वहीं उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा।
इस ग़मगीन खबर की तस्दीक़ नावेद भाई, अज्जू भाई और शुएब अकील भाई ने की है।
मरहूम के बड़े बेटे, नगर पालिका के पूर्व चेयरमैन हफ़ीज़ भारती हैं
🤲 दुआओं में याद रखिए:
अल्लाह तआला से दुआ है कि हाजी मोहम्मद मुस्तफीज़ अहमद साहब को जन्नतुल फिरदौस में आला मक़ाम अता फरमाए और उनके अहलेखाना को सब्र-ए-जमील दे।
कुछ लोग जाते नहीं… बस नज़र से ओझल हो जाते हैं।
हाजी साहब भी अब हमारे बीच नहीं, मगर उनका किरदार, उनकी सादगी और उनकी मोहब्बत हमेशा जिंदा रहेगी।
0 Comments