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ये मूर्ति किसकी है ? चर्चाओ का बाजार गरम,जिंदाबाद की भीड़, मूर्ति की राजनीति और अनसुनी आवाज़ें,नवाबगंज की जनता से देवरा की प्रतिमा तक — समाजवादी राजनीति का आत्ममंथन

तहलका टुडे टीम/सदाचारी लाला उमेश चंद्र श्रीवास्तव/मोहम्मद वसीक 

बाराबंकी,लोकतंत्र में सबसे बड़ा भ्रम तब पैदा होता है, जब संख्या ताक़त होती है, लेकिन प्रतिनिधित्व नहीं।

बाराबंकी ज़िले की राजनीति इन दिनों इसी भ्रम से गुजर रही है—जहाँ मुसलमान जनता संख्या में निर्णायक है, लेकिन भूमिका में सीमित; और जहाँ मूर्तियाँ स्पष्ट खड़ी हैं, लेकिन पहचान और जवाबदेही धुंधली।

देवरा (निंदूरा, कुर्सी) में हाल ही में स्थापित की गई प्रतिमा सिर्फ़ एक स्मारक नहीं है। वह एक संकेत है—उस राजनीति का, जो प्रतीकों से काम चलाती है और सवालों से बचती है। तीन बार विधायक और एक बार एमएलसी रहे कामरेड रामचंद्र बख्श सिंह के नाम पर लगी इस मूर्ति ने सम्मान से ज़्यादा बहस को जन्म दिया। बहस इस बात पर नहीं कि मूर्ति क्यों लगी, बल्कि इस बात पर कि किस राजनीति के तहत और किस संतुलन को साधने के लिए लगी

नवाबगंज: वोट की ताक़त, प्रतीक की दूरी

कामरेड रामचंद्र बख्श सिंह ने हमेशा नवाबगंज से चुनाव लड़ा—एक ऐसा क्षेत्र जहाँ मुसलमानों की आबादी निर्णायक रही है। वहीं से राजनीतिक संघर्ष हुआ, वहीं से जनसमर्थन मिला। लेकिन आज उनकी स्मृति का सबसे बड़ा प्रतीक नवाबगंज से बाहर, देवरा में खड़ा है।

यह सवाल स्वाभाविक है कि जब वोट का केंद्र नवाबगंज रहा, तो स्मृति का केंद्र कहीं और क्यों?
क्या यह सिर्फ़ प्रशासनिक सुविधा है, या बदलती राजनीतिक प्राथमिकताओं का संकेत?

बिरादरी की राजनीति और प्रतीकों का चयन

भारतीय जनता पार्टी द्वारा राम भुवन वर्मा को जिला अध्यक्ष बनाए जाने के बाद ज़िले में वर्मा बिरादरी की राजनीतिक सक्रियता और प्रतीकात्मक अहमियत बढ़ी है। ऐसे माहौल में देवरा में लगी मूर्ति को लेकर यह चर्चा तेज़ है कि क्या यह श्रद्धांजलि भर है, या सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों का हिस्सा।

ग्रामीणों की टिप्पणी सादी लेकिन गहरी है—
“मूर्ति इतिहास नहीं, संदेश देती है।”

मंच पर मौजूदगी और ग़ैरमौजूदगी

इस पूरे आयोजन में एक और तथ्य चर्चा का विषय बना—नगर विधायक सुरेश यादव और रामनगर विधायक फरीद महफूज किदवई का मंच पर न दिखना। राजनीति में अनुपस्थिति भी एक बयान होती है। जब प्रतिनिधि मंच से ग़ायब हों, तो सवाल खुद-ब-खुद खड़े हो जाते हैं।

समाजवादी पार्टी और मुसलमान राजनीति की सच्चाई

समाजवादी पार्टी की राजनीति में मुसलमान नेता और कार्यकर्ता लंबे समय से रीढ़ रहे हैं। लेकिन आज वही वर्ग यह महसूस कर रहा है कि उसकी भूमिका निर्णय लेने में नहीं, सिर्फ़ समर्थन जताने में रह गई है
नारे हैं, जिंदाबाद है—लेकिन हिस्सेदारी नहीं।

तीन दिन पहले हफीज़ भारती जैसे ज़मीनी नेता का बसपा में जाना इसी असंतोष का संकेत माना जा रहा है। वहीं असदुद्दीन उवैसी की पार्टी पहले ही कई सीटों पर समाजवादी समीकरण को चुनौती दे चुकी है।

विरासत और वर्तमान का फर्क

बेनी प्रसाद वर्मा की राजनीति एक दौर का प्रतीक रही—जहाँ ज़िले से लेकर केंद्र तक प्रभाव दिखता था। आज उसी विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश जारी है। फर्क बस इतना है कि तब जनाधार स्पष्ट था, आज रणनीति ज़्यादा और भरोसा कम है।

सवाल जो टल नहीं सकते

देवरा की प्रतिमा आज खामोशी से खड़ी है, लेकिन उसके इर्द-गिर्द सवाल लगातार घूम रहे हैं।
नवाबगंज की बहुसंख्यक जनता पूछ रही है—

अगर हमारी भूमिका सिर्फ़ “जिंदाबाद” तक है,
तो हमारी राजनीति कहाँ है?

लोकतंत्र मूर्तियों से नहीं, नुमाइंदों से मज़बूत होता है
और सियासत नारों से नहीं, न्यायपूर्ण हिस्सेदारी से टिकती है

जब तक यह अंतर समझा नहीं जाएगा, तब तक हर नई मूर्ति सम्मान से ज़्यादा सवाल खड़े करती रहेगी।

जिस दिन राजनीति
मुसलमानों को सिर्फ़ भीड़ नहीं,
बराबरी का साझेदार मानेगी—
शायद उस दिन
मूर्तियों से ज़्यादा
भरोसे गढ़े जाएँगे।


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