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राम अगर दिलों में उतर जाएँ तो राजनीति घबरा जाती है,बाराबंकी से उठा ऐसा दृश्य, जिसने देश की सियासत को आईना दिखा दिया


तहलका टुडे टीम

देश की राजनीति में श्री राम को लेकर अब तक एक तय स्क्रिप्ट चलती रही,
मंच हमारा, नारा हमारा, ठेका हमारा।
लेकिन बाराबंकी में यह स्क्रिप्ट अचानक फट गई।

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता फराज़ुद्दीन किदवई ने जब वरिष्ठ समाजवादी नेता अरविंद सिंह गोप को “जय श्री राम” लिखा राम मंदिर का स्मृति चिन्ह भेंट किया, तो यह कोई साधारण शिष्टाचार नहीं रहा। यह एक ऐसा दृश्य बन गया, जिसने उन तमाम राजनीतिक धारणाओं को हिला दिया, जिनकी नींव “डर” और “बँटवारे” पर टिकी थी।

अब सवाल सीधा है—
अगर मुसलमान राम का सम्मान करने लगें, तो नफरत का कारोबार किसके भरोसे चलेगा?

राम पोस्टर से निकलकर दिलों में आ गए

अब तक राम चुनावी रैलियों में मिलते थे—
लाउडस्पीकर पर ऊँची आवाज़ में,
पोस्टरों पर तल्ख नज़रों के साथ।

लेकिन बाराबंकी में राम न नारे बने, न हथियार—
वो एक स्मृति चिन्ह बने, सम्मान बने, और सबसे खतरनाक बात—
साझा संस्कृति का प्रतीक बन गए।

यही वो पल है, जहाँ राजनीति को सबसे ज़्यादा घबराहट होती है।

भाजपा में हड़कंप क्यों?

क्योंकि अगर यह मान लिया जाए कि

  • राम किसी पार्टी की संपत्ति नहीं हैं
  • आस्था पर एकाधिकार संभव नहीं
  • और मुसलमानों के दिलों में भी पुरुषोत्तम राम का सम्मान है

तो फिर वर्षों से गढ़ी गई वह दीवार अपने आप गिरने लगती है,
जिस पर “हम बनाम वो” लिखा गया था।

राजनीतिक गलियारों में अब फुसफुसाहट है—
“अगर यह तस्वीर आम हो गई, तो नैरेटिव कौन संभालेगा?”


हुनर मेला या राजनीति का एक्स-रे?

यह सब हुआ उस हुनर मेले में, जिसे गयासुद्दीन किदवाई सोशल एंड वेलफेयर फाउंडेशन ने महिलाओं के स्वावलंबन के लिए आयोजित किया था। मंच पर महिलाएं थीं, जिनके हाथों का हुनर बोल रहा था—और बैकग्राउंड में राजनीति अपनी सीमाएँ खोज रही थी।

सदर विधायक धर्मराज सिंह उर्फ सुरेश यादव, नगर पालिका अध्यक्ष शीला सिंह वर्मा, पूर्व प्रमुख सुरेंद्र सिंह वर्मा हाजी शहाब खालिद, हुमायूं नईम खान, फारुख मोबिन, अजय वर्मा बबलू,हाजी जाहिद ,हशमत अली सहित तमाम अतिथि महिलाओं की बनाई वस्तुओं की क्वालिटी पर बात कर रहे थे, लेकिन कैमरे उस क्षण को पकड़ चुके थे, जो देशभर में चर्चा का विषय बनने वाला था।

सबसे बड़ा व्यंग्य यही है

जो खुद को राम का इकलौता ठेकेदार समझते थे,
उनके राम अब बिना अनुमति के हर धर्म के अजीज हो गए।

जो सोचते थे कि सम्मान “लाइन पार” नहीं करता,
उन्हें बाराबंकी ने बता दिया—


संस्कृति की कोई सीमा रेखा नहीं होती।

यह घटना क्यों खतरनाक है (राजनीति के लिए)?

क्योंकि यह दृश्य बताता है कि
देश का समाज अब उस भाषा से आगे निकल चुका है,
जिसमें हर सवाल का जवाब “ध्रुवीकरण” होता था।

अब सवाल रोटी, रोज़गार, महिला स्वावलंबन और सम्मान का है—
और ऐसे सवालों के सामने नारे अक्सर बौने पड़ जाते हैं।

एक लाइन जो बहुत कुछ कह जाती है

यह खबर किसी के खिलाफ नहीं,
यह खबर डर की राजनीति के खिलाफ है।

यह राम की जीत नहीं,
यह उस भारत की जीत है
जहाँ राम मंदिर में भी हैं
और दिलों में भी—
बिना किसी पार्टी के टिकट के।


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