बाराबंकी,ज़ैदपुर की सरज़मीन एक बार फिर इतिहास बन गई। 28 रजब का वह क़दीमी और अज़ीम सफ़र-ए-इमामे हुसैन, जो सिर्फ़ एक जुलूस नहीं बल्कि हक़ और इंसाफ़ की सदियों पुरानी गवाही है, अपने रिवायती और पुरसोज़ अंदाज़ में पचदरी मस्जिद से बरामद हुआ।
जैसे ही पचदरी मस्जिद के दरवाज़े खुले, फ़ज़ा में एक अजीब सी खामोशी उतर आई—
खामोशी, जो मातम की आवाज़ों से टूट रही थी…
खामोशी, जिसमें “हुसैन… हुसैन” की सदा दिलों को चीर रही थी।
पचदरी से शबीहे कर्बला तक—एक चलता-फिरता इतिहास
जुलूस पचदरी मस्जिद से निकलकर बांध चौराहा, इमामबाड़ा गढ़ी जदीद, छोटी बाज़ार, इमामबाड़ा बड़ी सरकार, बड़ी बाज़ार होता हुआ शबीहे कर्बला ज़ैदपुर पहुंचा, जहाँ आंसुओं और सिसकियों के बीच यह अज़ीम सफ़र अपने अंजाम को पहुँचा।
हर गली, हर मोड़, हर बाज़ार गवाह बना उस पैग़ाम का—
कि हुसैन ज़िंदा है और यज़ीदियत आज भी शर्मिंदा है।
नौहों की सदा और सीने पीटते दिल
जुलूस में अंजुमन-ए-दस्ते हैदरी ज़ैदपुर के नौहाख्वान और मातमदार अपने सोज़ भरे नौहों के साथ चलते रहे। सीने पर पड़ती हर हाथ, कर्बला की याद दिला रही थी।
लखनऊ से आई अंजुमन गुलदस्तये हैदरी और बाराबंकी की अंजुमन ग़ुंचे अब्बासिया ने भी नौहा और मातम कर माहौल को और ग़मगीन कर दिया। ऐसा लगता था जैसे ज़ैदपुर की ज़मीन कर्बला बन गई हो।
अमारी, ज़ुलजनाह और कर्बला का ज़िंदा मंजर
जुलूस में ऊंट पर सजी अमारी, झूला, और ज़ुलजनाह की ज़ियारत कराई गई।
पचदरी मस्जिद से लेकर शबीहे कर्बला तक चलते ये अलामात सिर्फ़ निशान नहीं थे—
बल्कि वो ज़िंदा मंजर थे, जो हर आंख को नम और हर दिल को बेचैन कर रहे थे।
बुज़ुर्गों की आंखों में आंसू थे,
नौजवानों के सीने मातम से सुर्ख़ थे,
और बच्चों की निगाहों में कर्बला का सवाल था।
पहली मजलिस: मक़सद-ए-सफ़र-ए-हुसैन का बयान
पचदरी मस्जिद में जुलूस से पहले हुज्जतुल इस्लाम मौलाना हसनैन बाक़री साहब क़िब्ला ने पहली मजलिस को खिताब फ़रमाया। उन्होंने अहलेबैत के फ़ज़ाएल बयान करते हुए कहा—
“इमाम हुसैन का मदीने से कर्बला जाना कोई सियासी सफ़र नहीं था,
यह दीन की हिफ़ाज़त और इस्लाम की बक़ा का ऐलान था।”
उनके अल्फ़ाज़ सुनकर मजलिस में मौजूद हर शख़्स की आंखें छलक उठीं।
सबीलें—इंसानियत की खिदमत
जुलूस के दौरान पचदरी मस्जिद, रास्तों और कर्बला में अज़ादारों के लिए चाय और शरबत की सबीलों का एहतेमाम किया गया।
यह सिर्फ़ पानी या चाय नहीं थी—
यह हुसैनी मेहमाननवाज़ी थी।
अलविदाई मजलिस: ज़ंजीर के मातम के बाद सिसकता सन्नाटा
शबीहे कर्बला में ज़ंजीर के मातम के बाद जुलूस की अलविदाई मजलिस को जनाब मौलाना समर अब्बास ज़ैदपुरी साहब ने खिताब फ़रमाया। उनके दर्द भरे अल्फ़ाज़ ने ऐसा असर किया कि पूरी फ़ज़ा सिसकियों से भर गई।
शुक्रिया और दुआ
अंजुमन-ए-दस्ते हैदरी के अराकीन ने जुलूस में शिरकत करने वाले तमाम अज़ादारों, अंजुमनों और खिदमतगुज़ारों का शुक्रिया अदा किया।
यह जुलूस सिर्फ़ एक रस्म नहीं था
यह एक अहद था—
कि हुसैन के सफ़र को ज़िंदा रखा जाएगा,
कि ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ कभी ख़ामोश नहीं होगी,
और कि ज़ैदपुर की ज़मीन हर साल गवाही देती रहेगी—
“सलाम ऐ हुसैन… सलाम ऐ शहीद-ए-कर्बला।” 🏴
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