Hot Posts

6/recent/ticker-posts

तिरंगे की ओट में सियासी आत्मसमर्पण: जब कद्दावर नेता जुल्फी मिया पूर्व मंत्री राकेश वर्मा के साथ हाथ बांधे नज़र आए



अली मुस्तफा 

हज़रतपुर ,बाराबंकी - गणतंत्र दिवस पर निकली तिरंगा यात्रा ने एक बार फिर साबित कर दिया कि

देश भले आज़ाद हो,
लेकिन स्थानीय राजनीति अब भी मजबूरियों और गणित की कैद में है

हज़रतपुर के उसी कद्दावर दरवाज़े के नीचे—
जहां जुल्फी मिया की धाक, रुतबा और असर अपने आप में बयान हुआ करता है —
इस बार जो दृश्य उभरा, उसने पूरे इलाके को सोचने पर मजबूर कर दिया कि
कद कभी अपने आप नहीं घटता, वक्त आने पर उसे झुका दिया जाता है।

इलाके की सियासत में वर्षों से “किंगमेकर” माने जाने वाले,
पूर्व सांसद पी.एल. पुनिया के बेहद करीबी रहे
पूर्व प्रधान जुल्फी मिया,
इस बार पूर्व मंत्री राकेश वर्मा के सामने हाथ बांधे खड़े दिखाई दिए।

अब इसे तहज़ीब कहिए,
राजनीतिक शिष्टाचार कहिए
या फिर आने वाले चुनावों की एडवांस बुकिंग
लेकिन राजनीति में हाथ बांधकर खड़ा होना
कभी भी सिर्फ़ अदब नहीं होता,
अक्सर यह  खामोश बयान होता है।

जिस जुल्फी मिया के निकल आई मशहूर तोंद कभी इलाके में दबदबे और बेफिक्री की पहचान मानी जाती थी,
आज वही तोंद तिरंगे के नीचे खड़ी होकर यह इशारा कर रही थी कि
सियासत में वजन जिस्म का नहीं, समीकरणों का होता है—
और जब समीकरण बदलते हैं, तो हाथ अपने आप बंध जाते हैं।

उधर, विकास पुरुष स्व. बेनी प्रसाद वर्मा के पुत्र, पूर्व मंत्री राकेश वर्मा
सादगी की राजनीति करने वाले,
बिना ज़्यादा शोर-शराबे के मैदान में टिके रहने वाले नेता—
2022 के विधानसभा चुनाव में
महज़ 800 वोटों से कुर्सी तक नहीं पहुंच सके

राजनीति में 800 वोट की हार
असल में हार नहीं होती,
यह सिर्फ़ यह बताती है कि
खेल अब भी खुला है,
और अगली बाज़ी किसके नाम होगी—यह तय नहीं है।

रामनगर विधानसभा का सियासी इतिहास भी यही इशारा करता है।
यहां जिसने मुस्लिम समाज के भरोसे को साथ लिया,
वही सत्ता तक पहुंचा।
सरवर अली खान हों,
फरीद महफूज़ किदवई हों
या फिर अरविंद सिंह गोप—
मुस्लिम समर्थन उनके लिए जीत की सीढ़ी बना।

इसके उलट,
राकेश वर्मा को
अपने ही गृह क्षेत्र में
सपा का टिकट पाने तक के लिए
कई बार दुश्वारियों और संदेहों का सामना करना पड़ता रहा है,टिकट ही कट जाता है।
मुस्लिम समाज से दूरी की यह धारणा
हर चुनाव में
कुर्सी और जीत के बीच
एक अदृश्य दीवार बनती रही।

और शायद यही वजह है कि
इस बार नारे कम हैं,
भाषण छोटे हैं,
लेकिन तस्वीरें ज़्यादा बोल रही हैं

राजनीति के जानकार इस पूरे दृश्य को यूँ पढ़ रहे हैं—

“जब पुराने स्थानीय कद,
भविष्य की सत्ता का अंदाज़ा लगाकर
अपनी मुद्रा बदलने लगें,
तो समझ लीजिए
हवा दिशा बदल चुकी है।”

जुल्फी मिया का हाथ बांधकर खड़ा होना
दरअसल राकेश वर्मा के सामने झुकना नहीं,
बल्कि आने वाले राजनीतिक समय को सलाम है।

यह तस्वीर साफ़ बता रही है कि
अब राजनीति न तो नारों से लड़ी जा रही है,
न ही भाषणों से जीती जा रही है—
अब सियासत बॉडी लैंग्वेज और खामोशी में लिखी जा रही है।

गणतंत्र दिवस पर तिरंगा पूरे सम्मान के साथ लहराया,
लेकिन उसके नीचे
कई सियासी झंडे
बिना शोर किए
चुपचाप झुकते भी दिखाई दिए।

और यही है आज की असली राजनीति—
जहां शब्दों से पहले
हाथ बंध जाते हैं।


Post a Comment

0 Comments