Hot Posts

6/recent/ticker-posts

पीडीए आरक्षण के सहारे विधानसभा चुनाव की नैया पार लगाने की तैयार में सपा !छह माह पहले अचानक जागी सामाजिक न्याय की चिंता, क्या चुनावी रण में नया हथियार बना पीडीए?


 तहलका टुडे टीम/हसनैन मुस्तफ़ा 

बाराबंकी।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी लगभग छह माह का समय शेष है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी चुनावी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। बाराबंकी के छाया चौराहा स्थित समाजवादी पार्टी कार्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता को यदि ध्यान से देखा जाए तो यह केवल एक प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनाव का राजनीतिक ट्रेलर भी प्रतीत होती है।

मंच पर एक साथ राष्ट्रीय सचिव एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री अरविंद कुमार सिंह गोप, पूर्व कैबिनेट मंत्री राकेश वर्मा, रामनगर विधायक हाजी फरीद महफूज किदवई, सदर विधायक धर्मराज सिंह उर्फ सुरेश यादव, जैदपुर विधायक गौरव रावत, पूर्व विधायक रामगोपाल रावत, पूर्व विधायक राम मगन रावत, पूर्व विधान परिषद सदस्य अरविंद यादव, विधान परिषद सदस्य राजेश यादव राजू, राष्ट्रीय प्रवक्ता फैजान किदवई तथा जिलाध्यक्ष हाफिज अयाज अहमद सहित दर्जनों नेताओं की मौजूदगी ने साफ संकेत दे दिया कि पार्टी अब चुनावी मोड में प्रवेश कर चुकी है।

चुनाव का मौसम और मुद्दों का पुनर्जन्म

भारतीय राजनीति में एक पुरानी परंपरा है। जैसे ही चुनाव करीब आते हैं, वैसे ही कुछ मुद्दे अचानक राष्ट्रीय और प्रांतीय विमर्श के केंद्र में आ जाते हैं। बेरोजगारी, किसान, महंगाई, आरक्षण, संविधान, सामाजिक न्याय, पिछड़े वर्ग, दलित और अल्पसंख्यक—ये सभी विषय चुनावी मौसम में नई ऊर्जा के साथ सामने आते हैं।

बाराबंकी की इस प्रेस वार्ता में भी पीडीए (पिछड़ा, दलित और आधी आबादी) को केंद्र में रखकर भाजपा सरकार पर हमला बोला गया। नेताओं ने दावा किया कि 22 भर्तियों में पीडीए समाज को मिलने वाले 46,817 पदों के स्थान पर मात्र 35,303 पद दिए गए और 11,514 पदों का नुकसान किया गया।

आंकड़े गंभीर हैं और यदि इनमें सच्चाई है तो निश्चित रूप से जांच और जवाबदेही होनी चाहिए। लेकिन जनता का एक वर्ग यह भी पूछ रहा है कि यदि यह अन्याय वर्षों से हो रहा था तो इसका सबसे बड़ा विरोध चुनाव से ठीक पहले ही क्यों दिखाई दे रहा है?

पीडीए : सामाजिक न्याय या राजनीतिक समीकरण?

समाजवादी पार्टी ने पिछले कुछ वर्षों में पीडीए को अपनी राजनीति का सबसे बड़ा नारा बनाया है। पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और आधी आबादी। राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो उत्तर प्रदेश की लगभग पूरी चुनावी तस्वीर इसी सामाजिक समीकरण के इर्द-गिर्द घूमती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल सामाजिक न्याय का नारा नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े वोट बैंक को एक मंच पर लाने की रणनीति भी है।

इसीलिए जब मंच से आरक्षण की बात होती है तो विपक्ष इसे सामाजिक न्याय की लड़ाई बताता है और सत्ता पक्ष इसे चुनावी राजनीति का हिस्सा कहता है।

जनता पूछ रही है—पांच साल कहां थे?

प्रेस वार्ता के बाद राजनीतिक चर्चाओं में सबसे अधिक यही सवाल सुनाई दिया—

  • जब भर्ती परीक्षाओं को लेकर विवाद उठे थे, तब इतने बड़े स्तर पर आंदोलन क्यों नहीं हुआ?
  • जब बेरोजगार युवा लखनऊ और प्रयागराज की सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे थे, तब यह पूरी टीम कितनी बार उनके साथ खड़ी दिखाई दी?
  • जब गांवों में किसान फसलों के दाम और छुट्टा पशुओं से परेशान थे, तब कितनी बार ऐसी संयुक्त प्रेस वार्ताएं आयोजित हुईं?
  • और यदि पीडीए समाज के अधिकार इतने महत्वपूर्ण हैं तो चुनावी वर्ष में ही उनकी चिंता सबसे ज्यादा क्यों दिखाई देती है?

जनता का यह सवाल केवल समाजवादी पार्टी से नहीं बल्कि हर राजनीतिक दल से है।

बाराबंकी में सक्रिय हुआ समाजवादी कुनबा

काफी समय बाद बाराबंकी में समाजवादी पार्टी के लगभग सभी प्रमुख चेहरे एक मंच पर दिखाई दिए।

मंच पर जहां अरविंद गोप और राकेश वर्मा जैसे वरिष्ठ नेता थे, वहीं फरीद महफूज किदवई, सुरेश यादव और गौरव रावत जैसे वर्तमान विधायक भी मौजूद थे। इनके साथ रामगोपाल रावत, राम मगन रावत, अरविंद यादव, राजेश यादव राजू, फैजान किदवई और हाफिज अयाज अहमद सहित पूरा संगठन सक्रिय दिखाई दिया।

इसके अलावा सुरेंद्र सिंह वर्मा, लल्लन वर्मा, सुरेश चंद्र गौतम, हुमायूं नईम खान, वीरेंद्र प्रधान, प्रीतम सिंह वर्मा, नसीम कीर्ति, कामता प्रसाद यादव, अजय वर्मा बबलू, प्रद्युम्न यादव, रिजवान संजय, जसवंत यादव, जसवंत सिंह यादव, विजय यादव, आशीष सिंह आर्यन, राजकुमार वर्मा और अनिल यादव जैसे नेता और पदाधिकारी भी उपस्थित रहे।

राजनीतिक जानकार इसे संगठनात्मक शक्ति प्रदर्शन के रूप में भी देख रहे हैं।

भाजपा में हड़कंप या सपा में उत्साह?

प्रेस वार्ता के बाद समर्थकों ने दावा किया कि भाजपा में हड़कंप मच गया है।

हालांकि राजनीति के जानकार इस दावे पर मुस्कुराते हुए कहते हैं कि भारतीय राजनीति में "हड़कंप" शब्द उतना ही लोकप्रिय है जितना चुनावी घोषणापत्र में "ऐतिहासिक" शब्द।

ज्ञापन दिया जाए तो हड़कंप।
प्रेस वार्ता हो जाए तो हड़कंप।
धरना हो जाए तो हड़कंप।
सोशल मीडिया पोस्ट वायरल हो जाए तो भी हड़कंप।

असल हड़कंप तो मतदान वाले दिन ईवीएम के बटन दबने पर ही पता चलता है।

पीडीए की लड़ाई या चुनावी नाव का पतवार?

सवाल यह नहीं है कि पीडीए का मुद्दा महत्वपूर्ण है या नहीं। सवाल यह है कि इस मुद्दे को उठाने की मंशा क्या है?

यदि उद्देश्य वास्तव में सामाजिक न्याय है तो यह लड़ाई चुनाव के बाद भी जारी रहनी चाहिए।

लेकिन यदि उद्देश्य केवल चुनावी नैया पार लगाना है तो जनता अब पहले जैसी भोली नहीं रही। सोशल मीडिया और डिजिटल युग में मतदाता नेताओं के भाषण ही नहीं, उनकी अनुपस्थिति भी याद रखते हैं।

जनता की अदालत सबसे बड़ी

राजनीतिक मंचों पर चाहे जितने आरोप-प्रत्यारोप लग जाएं, प्रेस वार्ताओं में चाहे जितने आंकड़े पेश कर दिए जाएं, अंततः फैसला जनता को करना है।

जनता यह देखेगी कि किसने केवल भाषण दिए और किसने जमीन पर काम किया।

किसने चुनाव के समय पीडीए को याद किया और किसने पूरे पांच साल उसके अधिकारों की लड़ाई लड़ी।

"अरविंद गोप से लेकर राकेश वर्मा तक, फरीद किदवई से लेकर सुरेश यादव तक, गौरव रावत से लेकर राजेश यादव राजू तक—सभी नेता एक मंच पर थे, सभी के स्वर में सामाजिक न्याय था, सभी के शब्दों में आरक्षण था और सभी की निगाहें... शायद 2027 की विधानसभा सीटों पर भी थीं।"

जनता चुपचाप सब सुन रही है।
उसे पीडीए भी याद है, आरक्षण भी याद है, और यह भी याद है कि चुनाव आने में अब केवल छह महीने बाकी हैं।


"लोकतंत्र में जनता सबसे बड़ी पत्रकार होती है, जो हर बयान की कटिंग अपने दिल और दिमाग में संभालकर रखती है।"

Post a Comment

0 Comments