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हर दिल में हुसैन, हर आंख में अश्क,तीसरी मोहर्रम पर दोस्त हबीब इब्ने मज़ाहिर की वफ़ा का बयान, अली असगर (अ.) की याद में झुका बाराबंकी। “जहाँ इल्म होता है वहीं अदल होता है” — मौलाना फैज़ान मेहदी ज़ैदपुरी“,इंसान गलतफ़हमी का शिकार है, निज़ाम बनाने वाला परवरदिगार है”—मौलाना मोहम्मद मियां आब्दी“ ज़ुल्म वही करता है जो आजिज़ होता है, अल्लाह तो आदिल है”

✍️ हसनैन मुस्तफ़ा 

बाराबंकी, 19 जून।मोहर्रम की तीसरी तारीख़ और पहला जुमा बाराबंकी की तारीख़ में अज़ादारी के एक रौशन और पुरअसर दिन के रूप में दर्ज हुआ। सुबह से देर रात तक शहर से लेकर दूरदराज़ गांवों तक मजलिसों, मातम, नौहाख़्वानी और ज़िक्र-ए-शोहदाए कर्बला का सिलसिला जारी रहा। हर तरफ़ “या हुसैन... या हुसैन...” की सदाएं बुलंद होती रहीं और अज़ादारों की आंखों से बहने वाले अश्क कर्बला की याद को ताज़ा करते रहे।

इस वर्ष मोहर्रम का पहला जुमा शहीद-ए-मासूम हज़रत अली असगर (अ.) के नाम रहा, जबकि मजलिसों में वफ़ा, शुजाअत और इमामत के अलमबरदार हबीब इब्ने मज़ाहिर (अ.) का पुरदर्द तज़किरा किया गया। ज़ाकिरों और उलमा ने उनके किरदार को हक़, वफ़ादारी और ईमान की बुलंद मिसाल बताते हुए कहा कि कर्बला केवल एक जंग नहीं बल्कि इंसाफ़ और इंसानियत की जंग थी।

🌑 “जहाँ इल्म होता है वहीं अदल होता है, जहाँ ज़ुल्म होता है वहाँ जहालत होती है”

अजाखाना आग़ा फ़य्याज़ मियांजानी में खिताब करते हुए मौलाना फैज़ान मेहदी ज़ैदपुरी ने कहा:

“जहाँ इल्म होता है वहीं अदल होता है और जहाँ ज़ुल्म होता है वहाँ जहालत होती है। हक़ हमेशा इंसाफ़ के दायरे में होता है। जानबूझकर हक़ को छुपाना इंसान को गुमराही की तरफ़ ले जाता है।”

उन्होंने कहा कि हुसैनियत इंसान को अंधेरों से निकालकर रोशनी की तरफ़ ले जाने का नाम है और जो नेमतों की नाशुक्री करता है, उसे रुसवाई का सामना करना पड़ता है।

🕌 “इंसान गलतफ़हमी का शिकार है, निज़ाम बनाने वाला परवरदिगार है”

इमामबाड़ा मौलाना गुलाम अस्करी हॉल में मौलाना मोहम्मद मियां आब्दी ने अपने बयान में कहा:

“इंसान गलतफ़हमी का शिकार है, जबकि निज़ाम बनाने वाला परवरदिगार है। ज़ुल्म वही करता है जो आजिज़ होता है, अल्लाह तो आदिल है।”

उन्होंने कहा कि दुनिया के सारे निज़ाम इंसानी कमज़ोरियों का शिकार हो सकते हैं, लेकिन ख़ुदा का निज़ाम इंसाफ़ और रहमत पर कायम है।

🌹 “हुसैनी बच्चा भी बड़े-बड़े सूरमाओं का घमंड तोड़ देता है”

इमामबाड़ा मीर मासूम अली (कटरा) में मौलाना जाबिर जौरासी ने कहा:

“परवरदिगार की मदद से हुसैनी बच्चा भी बड़े-बड़े सूरमाओं का घमंड तोड़ देता है।”

उन्होंने कहा कि तक़वे के बगैर इल्म इंसान को तबाही की तरफ़ ले जाता है और जब लालच हावी हो जाता है तो इंसान दीन और इंसानियत से दूर हो जाता है।

मजलिस का आगाज़ मोहम्मद इसहाक ‘अली मियां’ ने तिलावत-ए-कुरआन से किया जबकि मौलाना अली मेहदी, मुज़फ्फर इमाम और हाजी सरवर अली कर्बलाई ने नज़राने-ए-अकीदत पेश किए।

“जब हक़ आता है तो बातिल भागता है”

रसूलपुर स्थित मोहसिन साहब के अजाखाने में मौलाना अशरफ़ अली ग़रवी ने कहा:

“सादिक़-ए-आले मोहम्मद (अ.) की शख़्सियत ऐसी है कि दुश्मन भी तारीफ़ करने पर मजबूर हो जाता है। जब हक़ आता है तो बातिल भागता है। मोहम्मद व आले मोहम्मद जैसा कोई नहीं।”

मजलिस में कशिश सण्डीलवी, मुज़फ्फर इमाम और आबान सल्लमहू ने कलाम-ए-अकीदत पेश किया।

🌅 “ख़ुदा ने कभी कोई ज़माना हादी से खाली नहीं छोड़ा”

करबला सिविल लाइंस में आयोजित मजलिस को खिताब करते हुए मौलाना हिलाल अब्बास ने कहा:

“ख़ुदा ने कभी कोई ज़माना हादी से खाली नहीं छोड़ा।”

उन्होंने कहा कि इंसानियत की हिदायत के लिए हर दौर में अल्लाह ने अपने प्रतिनिधि भेजे और कर्बला उसी हिदायत का सबसे रौशन अध्याय है।

यहाँ हाजी सरवर अली कर्बलाई, आबान और केयान ने भी अपने कलाम पेश किए।

🕯️ फरश-ए-अज़ा बना नजात का सफ़ीना

वक़्फ़ नवाब अमजद अली ख़ाँ, बेगमगंज में आयोजित मजलिस में मौलाना इमरान शकील ने शोहदाए कर्बला की कुर्बानियों पर रौशनी डाली। हाजी सरवर अली कर्बलाई ने नज़राने-ए-अकीदत पेश किए। मसायब का बयान शुरू होते ही पूरा माहौल ग़म और अकीदत में डूब गया और अज़ादारों की आंखों से अश्कों का सिलसिला जारी हो गया।

मजलिस के बानी सरवर अली रिज़वी ने तमाम अज़ादारों और मेहमानों का शुक्रिया अदा किया।

📍 गांव-गांव पहुंचा कर्बला का पैग़ाम

जैदपुर, केसरवा सादात, असंद्रा, मोथरी, फतेहपुर, बेलहरा, मौतिकपुर, मीरापुर, बिलाव, जरगावा, आलमपुर, देवरा, संगौरा, मिर्चिया, भानमऊ, चंदवारा, मितताई, कुर्सी, देवा शरीफ, मझगांव शरीफ, मसौली, कित्तूर, बड़ोसराय, हज़रतपुर, रसूलपुर और जौरास समेत जिले के सैकड़ों गांवों और कस्बों में मजलिसों, मातम और नौहाख़्वानी का सिलसिला दिन भर जारी रहा।

हर अजाखाना, हर इमामबाड़ा और हर फ़र्श-ए-अज़ा इस बात की गवाही देता नज़र आया कि हुसैनियत किसी एक दौर या एक कौम का नाम नहीं, बल्कि इंसाफ़, इंसानियत, सब्र और वफ़ा की वह जिंदा तहरीक है जो सदियों बाद भी दिलों में धड़कती है।


“तीसरी मोहर्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया कि बाराबंकी की सरज़मीन पर अज़ादारी सिर्फ़ एक रस्म नहीं, बल्कि हुसैन (अ.) के मिशन से मोहब्बत, इंसाफ़ की हिमायत और ज़ुल्म के खिलाफ़ ऐलान-ए-बग़ावत का नाम है।” 🖤🥀

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