तहलका टुडे टीम/सदाचारी लाला उमेश चंद्र श्रीवास्तव
आलमपुर,बाराबंकी
करबला की पहचान केवल शहादत से नहीं, बल्कि इंसानियत की ख़िदमत से भी होती है। यही वजह है कि सदियों बाद भी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का पैग़ाम मज़हब की सीमाओं से ऊपर उठकर हर उस दिल तक पहुँचता है, जो इंसाफ़, मोहब्बत और भाईचारे पर यक़ीन रखता है।
11वीं मोहर्रम को हैदरगढ़ विधानसभा क्षेत्र के ग्राम आलमपुर सैयदवाड़ा में कुछ ऐसा ही भावपूर्ण दृश्य देखने को मिला। उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री अरविंद सिंह गोप एक जनप्रतिनिधि के रूप में नहीं, बल्कि अकीदतमंद और ख़ादिम बनकर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रौज़ए मुबारक पर पहुँचे। उन्होंने यौमे ज़ैनब (स.अ.) के अवसर पर निकले अलम के जुलूस में श्रद्धापूर्वक सहभागिता की और करबला के शहीदों को ख़िराज-ए-अकीदत पेश किया।
कार्यक्रम का सबसे मार्मिक दृश्य तब सामने आया, जब पूर्व मंत्री स्वयं सबील पर खड़े होकर दूर-दराज़ से आए ज़ायरीन को अपने हाथों से चाय पिलाते और तबर्रुक वितरित करते दिखाई दिए। उनके इस व्यवहार ने यह संदेश दिया कि इमाम हुसैन की बारगाह में पहचान पद या प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि सेवा, विनम्रता और इंसानियत से होती है।
लगभग दो दशकों से लगातार मोहर्रम के अवसर पर रौज़ए मुबारक पर हाज़िरी देने की उनकी परंपरा आज भी बिना किसी व्यवधान के जारी है। यह सिलसिला केवल व्यक्तिगत श्रद्धा का नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की गंगा-जमुनी तहज़ीब, सामाजिक सद्भाव और साझा सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण बन चुका है।
इस अवसर पर पूर्व विधायक राम मगन रावत, समाजसेवी मोहम्मद अकील, हशमत अली गुड्डू, फ़ज़ल जैदी, खैराती भाई सहित अनेक जनप्रतिनिधि, समाजसेवी तथा विभिन्न समुदायों के हजारों श्रद्धालु और ज़ायरीन मौजूद रहे। पूरे परिसर में "या हुसैन" की सदाएँ गूँजती रहीं और श्रद्धा, सेवा तथा भाईचारे का वातावरण उपस्थित लोगों को भावुक करता रहा।
आयोजन ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम किसी एक मज़हब के नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत के रहबर हैं। उनकी कुर्बानी आज भी हर उस व्यक्ति को प्रेरित करती है, जो अन्याय के विरुद्ध खड़ा होने और मानवता की सेवा को अपना धर्म मानता है।
करबला की यही सबसे बड़ी ताक़त है—यह लोगों को बाँटती नहीं, बल्कि जोड़ती है; नफ़रत नहीं, मोहब्बत सिखाती है; और सत्ता नहीं, सेवा का रास्ता दिखाती है। शायद इसी वजह से हर साल लाखों दिल करबला की याद में झुकते हैं और हर बार इंसानियत पहले से कहीं अधिक ऊँची होकर सामने आती है।
लब्बैक या हुसैन।
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