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"या हुसैन" की सदाओं से गूंज उठा बाराबंकी, पांचवीं मोहर्रम पर अलम का निकला जुलूस,बगैर मारिफ़त-ए-अहलेबैत कामयाबी मुमकिन नहीं — मौलाना मोहम्मद मियां आब्दी,औन व मोहम्मद के मसायब सुनकर जगह-जगह अश्कबार हुए अज़ादार



तहलका टुडे टीम/सदाचारी लाला उमेश चंद्र श्रीवास्तव मोहम्मद
 

बाराबंकी।मोहर्रम की पांचवीं तारीख को बाराबंकी की सरज़मीं एक बार फिर कर्बला की यादों से सराबोर नज़र आई। जिले की फ़िज़ा में हर तरफ़ "या हुसैन... या हुसैन..." की सदाएं गूंजती रहीं और अज़ादारों ने शहीद-ए-कर्बला इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके वफ़ादार साथियों को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश किया। शहर से लेकर गांवों तक मजलिसों, मातम, नौहाख्वानी और मसायब का सिलसिला देर रात तक जारी रहा।
सुन्नी समुदाय की ओर से निकाला गया अलम का जुलूस फज़लुर्रहमान पार्क से रवाना होकर कर्बला वजहन शाह पहुंचा और वहां से वापस पीर बटावन पर संपन्न हुआ। जुलूस में छोटे-छोटे मासूम बच्चे हाथों में अलम लिए और लबों पर "या हुसैन" के नारे सजाए हुए चल रहे थे। रास्ते भर अंजुमनों ने नौहाख्वानी और सीनाजनी के ज़रिये अपने जज़्बात का इज़हार किया।

मजलिसों में गूंजा कर्बला का पैग़ाम

जिले के इमामबाड़ों, अज़ाखानों और धार्मिक केंद्रों में आयोजित मजलिसों में कर्बला की कुर्बानियों, सब्र, इस्तिक़ामत और हक़ की राह पर डटे रहने का पैग़ाम दिया गया।

देवा रोड स्थित गुलाम अस्करी हाल में मजलिस को ख़िताब करते हुए मौलाना मोहम्मद मियां आब्दी ने कहा—

"बगैर मारिफ़त-ए-अहलेबैत कामयाबी मुमकिन नहीं। जिस तरह कुरआन की तिलावत उस वक़्त तक मुकम्मल फायदा नहीं देती जब तक उसके मक़सद और पैग़ाम को न समझा जाए, उसी तरह अहलेबैत की पहचान और उनकी सीरत को समझे बिना इंसान हक़ीक़ी कामयाबी हासिल नहीं कर सकता।"

उन्होंने कहा कि जो इंसान इलाही क़ुव्वतों पर भरोसा करते हुए पाकीज़ा नीयत और नेक अमल के साथ ज़िंदगी गुज़ारता है, उसके सामने बड़े से बड़ा दुश्मन भी टिक नहीं पाता।

मजलिस में हज़रत औन व मोहम्मद (अ.स.) के मसायब बयान किए गए, जिन्हें सुनकर अज़ादारों की आंखें अश्कबार हो गईं। अंजुमन "गुलाम-ए-अस्करी" ने दर्दभरे नौहे पेश किए और सीनाजनी कर शहीदों को ख़िराज-ए-अक़ीदत अर्पित किया।

हक़ की तलाश है तो दर-ए-हुसैन पर आओ

कटरा स्थित इमामबाड़ा मीर मासूम अली में मौलाना जाबिर जौरासी ने अशरे की पांचवीं मजलिस को ख़िताब किया। मजलिस का आग़ाज़ तिलावत-ए-कुरआन से हुआ।

आगा फ़ैयाज़ मियां जानी के अज़ाखाने में मौलाना फैज़ान मेहदी रिज़वी ने कहा

 "हक़ की तलाश हो तो दर-ए-हुसैन पर आओ। अहलेबैत-ए-रसूल से मोहब्बत करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा अमीर इंसान है।"

इस अवसर पर डॉ. मुहिब मौरानवी, मुज़फ्फर इमाम और मोहम्मद रज़ा सल्लमहू ने अपने कलाम के माध्यम से नज़राना-ए-अक़ीदत पेश किया।

ज़ालिम से हिसाब लेने वाला अल्लाह गाफ़िल नहीं

गुलिस्तान-ए-शेर स्थित एक्तेदार साहब के अज़ाखाने में प्रोफेसर शहाब साहब ने कहा—

 "ज़ालिम कभी यह न समझे कि अल्लाह उसके ज़ुल्म से गाफ़िल है। वह हर अत्याचार का हिसाब लेता है। इतिहास गवाह है कि जब अल्लाह ज़ालिम ताक़तों को सज़ा देता है तो ऐसे रास्ते चुनता है जिनकी किसी को उम्मीद नहीं होती।"

हक़ तक पहुंचना है तो पहले बातिल से इंकार करो

रसूलपुर स्थित अज़ाखाने में मौलाना अशरफ़ अली ग़रवी ने कहा

 "आक़िल इंसान बिना मक़सद कोई कदम नहीं उठाता। अगर हक़ तक पहुंचना चाहते हो तो सबसे पहले बातिल से इंकार करना सीखो।"

वहीं करबला सिविल लाइन्स में मौलाना हिलाल तथा रिफ़ाक़त रिज़वी के अज़ाखाने में मौलाना अली मेहदी ने मजलिसों को ख़िताब किया।

इमामबाड़ा वक़्फ़ नवाब अमजद अली ख़ान में मौलाना इमरान शकील रिज़वी ने कहा—

"जहां हक़ नहीं होता, वहां मुक़द्दर में सिर्फ़ तबाही लिखी होती है।"

*हर अज़ाखाना बना कर्बला की यादों का मरकज़*

बेगमगंज स्थित इमामबाड़ा जनाबे ज़ैनब (स.अ.), मरहूम सैय्यद शरीफ़ुल हसन ज़ैदी, सैय्यद नजमुल हसन ज़ैदी, अतहर हुसैन एडवोकेट, हैदर हाउस, एजाज़ हुसैन, आले मोहम्मद आब्दी, अख़्तर हुसैन, नाज़िम साहब, तकीउल हसन ज़ैदी, अस्करी नगर, नासिर साहब और नवाब साहब समेत अनेक अज़ाखानों में मजलिसों का सिलसिला जारी रहा। देर रात तक नौहाख्वानी, मर्सिया और मसायब पढ़े जाते रहे।

*गांव-गांव तक पहुंची अज़ा की सदाएं*

शहर ही नहीं बल्कि जिले के दूरदराज़ इलाक़ों में भी मोहर्रम की पांचवीं तारीख़ पूरे एहतराम और अकीदत के साथ मनाई गई। तकिया, सट्टी बाज़ार, पीर बटावन, जैदपुर, असन्दरा, किंतूर, मौथरी, केसरवा, मित्तई, देवा शरीफ़, मझगवां, बेलहरा, फतेहपुर, हैदरगढ़, आलमपुर, देवरा, मोतिकपुर, कादिरपुर, मीरापुर, बिलाव, चंदवारा, टेसवा, इब्राहिमाबाद और जौरास समेत तमाम गांवों और कस्बों में मजलिसें और मातम जारी रहे।

*कर्बला सिर्फ़ एक वाक़िया नहीं, इंसाफ़ और हिदायत का पैग़ाम है*

मोहर्रम की पांचवीं तारीख़ ने एक बार फिर साबित कर दिया कि कर्बला का पैग़ाम आज भी ज़िंदा है। अज़ादारों की आंखों से बहते आंसू, बच्चों के हाथों में लहराते अलम और "या हुसैन" की सदाएं इस बात की गवाही दे रही थीं कि शहीद-ए-कर्बला की कुर्बानी इंसानियत, इंसाफ़ और हक़ की राह में हमेशा मशाल बनकर रोशनी देती रहेगी।

कर्बला हमें सिखाती है कि सिर्फ़ इबादत काफ़ी नहीं, बल्कि उसके मक़सद को समझना भी ज़रूरी है। जिस तरह कुरआन की तिलावत उसके पैग़ाम को समझे बिना मुकम्मल असर पैदा नहीं करती, उसी तरह हुसैनी तालीमात की मारिफ़त के बिना इंसान हक़ीक़ी कामयाबी और हिदायत तक नहीं पहुंच सकता।

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