लखनऊ। नजफ़-ए-हिंद जोगीरामपुरा में जश्न-ए-ग़दीर की महफ़िल पूरी शानो-शौकत के साथ सजी। मौला अली (अ.) की विलायत का पैग़ाम बुलंद हुआ, आफताब-ए-शरीयत मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नकवी की सदारत में हजारों अकीदतमंदों ने शिरकत की, लेकिन महफ़िल खत्म होने के बाद लोगों की जुबान पर एक ही सवाल था—"चेयरमैन साहब आखिर गए कहाँ?"
पोस्टर में तस्वीर थी, नाम था, परिचय था, स्वागत था, लेकिन जब महफ़िल का वक्त आया तो चेयरमैन साहब का कहीं अता-पता नहीं था। लोगों ने मजाक में करना शुरू कर दिया कि शायद पोस्टर तक पहुंचना आसान था, मगर जोगीरामपुरा पहुंचना मुश्किल पड़ गया।
महफ़िल में मौजूद लोगों के बीच तरह-तरह की चर्चाएं होती रहीं। कोई कह रहा था कि शायद रास्ता भटक गए होंगे, तो कोई बोला कि शायद गूगल मैप भी उन्हें नजफ़-ए-हिंद तक नहीं पहुंचा पाया। कुछ लोगों ने मुस्कुराते हुए कहा कि जहां सवाल ज्यादा हों, वहां पहुंचने का साहस भी बड़ा होना चाहिए।
वक्फ मामलों को लेकर पिछले कई महीनों से समाज में उठ रही चर्चाओं के बीच चेयरमैन साहब की यह अनुपस्थिति लोगों को और सोचने पर मजबूर कर गई। आखिर जिस मंच पर जवाबदेही, अमानतदारी और इंसाफ की बातें हो रही थीं, उसी मंच से दूरी क्यों?
महफ़िल में मौजूद एक बुजुर्ग ने व्यंग्य करते हुए कहा, "लगता है पोस्टर छपवाने वालों ने यह नहीं बताया था कि मंच पर आफताब-ए-शरीयत भी मौजूद रहेंगे।" वहीं एक अन्य शख्स ने हंसते हुए कहा, "तस्वीर भेज देना और खुद पहुंच जाना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।"
ग़दीर की महफ़िल में जब हज़रत अली (अ.) की हुकूमत, इंसाफ और सार्वजनिक अमानतों की हिफाजत पर बयान हो रहे थे, तब लोगों के बीच यह चर्चा भी जारी रही कि आखिर ऐसे मौके पर चेयरमैन समाज के बीच आकर अपनी बात क्यों नहीं रखते।
कुछ लोगों ने तो यहां तक कह दिया कि आजकल राजनीति में सबसे सुरक्षित जगह पोस्टर ही रह गई है—तस्वीर भी रहती है, नाम भी रहता है और सवालों का सामना भी नहीं करना पड़ता।
महफ़िल खत्म हुई, लोग अपने घर लौट गए, लेकिन एक सवाल वहीं छोड़ गए—अगर सब कुछ ठीक है तो दूरी क्यों? और अगर दूरी है तो वजह क्या है?
फिलहाल चेयरमैन की खामोशी भी चर्चा में है और उनकी गैरमौजूदगी भी। जश्न-ए-ग़दीर की इस महफ़िल ने एक बार फिर साबित कर दिया कि कभी-कभी मंच पर मौजूद लोगों से ज्यादा चर्चा उन लोगों की होती है जो मंच तक पहुंच ही नहीं पाते।
सच की वह आवाज़ जिसे दबाया नहीं जा सकता
"जब ज़मीर जागता है, तो तख़्त हिलते हैं और झूठ बेनक़ाब होता है।"
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