तहलका टुडे टीम,
बाराबंकी की पहचान केवल एक ज़िले की नहीं है। यह देवा शरीफ़ की मोहब्बत, महादेवा की आस्था और अयोध्या के प्रवेश द्वार की तहज़ीब का नाम है। यहाँ आने वाला हर व्यक्ति इंसानियत, सम्मान और विनम्रता का संदेश लेकर जाता है।
लेकिन हाल ही में एक ऐसा दृश्य सामने आया जिसने कई संवेदनशील दिलों को बेचैन कर दिया।
लेकिन कुछ ही क्षण बाद वही पंखुड़ियाँ जूतों के नीचे थीं।
गुलाब तो हमेशा देता है, बदले में कुछ नहीं मांगता
गुलाब इंसान की तरह शिकायत नहीं करता।
वह हर खुशी और हर ग़म का साथी होता है।
चाटुकारों की दुनिया में भावनाएँ सबसे सस्ती चीज़ बन जाती हैं
हमारे समाज में एक अजीब बीमारी फैल चुकी है।
यह सम्मान कम और चाटुकारिता का प्रदर्शन ज़्यादा लगता है।
क्योंकि जहाँ सच्चा सम्मान होता है, वहाँ सम्मान की वस्तु को अपमानित नहीं किया जाता।
सवाल गुलाब का नहीं, संवेदनशीलता का है
यह लेख किसी व्यक्ति के इरादों पर टिप्पणी नहीं है।
न ही यह कहना उचित होगा कि किसी ने जानबूझकर ऐसा किया।
लेकिन सार्वजनिक जीवन में प्रतीकों की अपनी अहमियत होती है।
क्योंकि जनता चेहरों से पहले व्यवहार पढ़ती है।
दृश्यों से पहले संदेश समझती है।
क्या गरीब मरीज की पीड़ा भी इसी तरह अनदेखी होगी?
क्या अस्पताल के बरामदे में घंटों बैठा बुज़ुर्ग भी सिर्फ़ एक फाइल बनकर रह जाएगा?
क्या दवा के लिए भटकती माँ की आँखों के आँसू भी इसी तरह बेमायने हो जाएँगे?
अगर पंखुड़ियाँ बोल पातीं...
अगर उन गुलाब की पंखुड़ियों को अल्लाह ने ज़ुबान दी होती तो शायद वे रोते हुए कहतीं—
"हम तुम्हारे स्वागत के लिए बिछाई गई थीं।"
"हमारे अंदर उन कर्मचारियों की मोहब्बत थी जिन्होंने हमें अपने हाथों से सजाया था।"
"हमारी खुशबू तुम्हारे सम्मान के लिए थी।"
"लेकिन तुम हमारे ऊपर से गुज़र गए।"
"अब हमें डर है कि कहीं हमारे बाद गरीबों की उम्मीदें भी इसी तरह कुचली न जाएँ।"
बाराबंकी की जनता फूल नहीं, इंसान है
गुलाब की पंखुड़ियाँ तो फिर भी बेज़ुबान थीं।
लेकिन बाराबंकी की जनता बेज़ुबान नहीं है।
उसे अस्पतालों में दवाएँ चाहिएँ, मशीनें चाहिएँ, डॉक्टर चाहिएँ, इलाज चाहिए।
उसे स्वागत समारोहों से ज़्यादा अस्पतालों में इंसानियत चाहिए।
उसे फूलों की खुशबू से ज़्यादा संवेदनशील प्रशासन की ज़रूरत है।
देवा की सरज़मीं से लेकर महादेवा के धाम तक और अयोध्या के द्वार तक आज एक ख़ामोश सवाल गूंज रहा है—
यह सवाल किसी एक व्यक्ति से नहीं, पूरे तंत्र से है।
क्योंकि कुचली हुई पंखुड़ियाँ दोबारा नहीं खिलतीं।
और टूटे हुए भरोसे को फिर से महकने में बहुत समय लगता है।
0 Comments