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"आज गुलाब कुचले गए हैं सीएमओ डॉ रंजन गौतम साहब, कल कहीं गरीबों की उम्मीदें न कुचल जाएँ...देवा-महादेवा और अयोध्या के द्वार से उठता एक सवाल — क्या संवेदनशीलता केवल स्वागत समारोहों तक सीमित रह गई है?

तहलका टुडे टीम,

बाराबंकी की पहचान केवल एक ज़िले की नहीं है। यह देवा शरीफ़ की मोहब्बत, महादेवा की आस्था और अयोध्या के प्रवेश द्वार की तहज़ीब का नाम है। यहाँ आने वाला हर व्यक्ति इंसानियत, सम्मान और विनम्रता का संदेश लेकर जाता है।

लेकिन हाल ही में एक ऐसा दृश्य सामने आया जिसने कई संवेदनशील दिलों को बेचैन कर दिया।

नए सीएमओ डॉ. रंजन गौतम के स्वागत में गुलाब की नाज़ुक पंखुड़ियाँ बिछाई गईं। वे पंखुड़ियाँ, जिनमें कर्मचारियों की मोहब्बत, शुभकामनाएँ और सम्मान छिपा था। वे पंखुड़ियाँ, जो अपनी खुशबू से वातावरण को महका रही थीं। वे पंखुड़ियाँ, जो शायद यह उम्मीद कर रही थीं कि कोई उनकी ख़ामोश भाषा को भी समझेगा।

लेकिन कुछ ही क्षण बाद वही पंखुड़ियाँ जूतों के नीचे थीं।

कोई आवाज़ नहीं हुई।

कोई विरोध नहीं हुआ।

कोई दर्द दिखाई नहीं दिया।

लेकिन जो लोग भावनाओं को पढ़ना जानते हैं, उन्हें लगा जैसे गुलाब की हर पंखुड़ी एक सवाल बनकर बिखर गई हो।

गुलाब तो हमेशा देता है, बदले में कुछ नहीं मांगता

गुलाब इंसान की तरह शिकायत नहीं करता।

वह खुशबू देता है।

सुकून देता है।

मोहब्बत का पैग़ाम देता है।

मजारों पर भी चढ़ता है, मंदिरों में भी सजता है, बारातों में भी बिखरता है और जनाज़ों पर भी रखा जाता है।

वह हर खुशी और हर ग़म का साथी होता है।

लेकिन शायद दुनिया का सबसे बदनसीब फूल भी गुलाब ही है, क्योंकि सम्मान के नाम पर सबसे पहले वही कुचला जाता है।

चाटुकारों की दुनिया में भावनाएँ सबसे सस्ती चीज़ बन जाती हैं

हमारे समाज में एक अजीब बीमारी फैल चुकी है।

कुछ लोग अधिकारियों के स्वागत में अपनी वफ़ादारी साबित करने के लिए फूलों के ढेर लगा देते हैं, मालाओं का पहाड़ खड़ा कर देते हैं, पंखुड़ियों का कालीन बिछा देते हैं।

फिर वही लोग ताली बजाते हुए देखते रहते हैं कि जिन फूलों को उन्होंने सम्मान का प्रतीक बताया था, वे कुछ सेकंड बाद पैरों के नीचे बिखरे पड़े हैं।

यह सम्मान कम और चाटुकारिता का प्रदर्शन ज़्यादा लगता है।

क्योंकि जहाँ सच्चा सम्मान होता है, वहाँ सम्मान की वस्तु को अपमानित नहीं किया जाता।

सवाल गुलाब का नहीं, संवेदनशीलता का है

यह लेख किसी व्यक्ति के इरादों पर टिप्पणी नहीं है।

न ही यह कहना उचित होगा कि किसी ने जानबूझकर ऐसा किया।

लेकिन सार्वजनिक जीवन में प्रतीकों की अपनी अहमियत होती है।

क्योंकि जनता चेहरों से पहले व्यवहार पढ़ती है।

दृश्यों से पहले संदेश समझती है।

और जब जनता देखती है कि स्वागत में बिछी भावनाएँ जूतों तले चली गईं, तो उसके मन में अनायास प्रश्न उठते हैं।

क्या गरीब मरीज की पीड़ा भी इसी तरह अनदेखी होगी?

क्या अस्पताल के बरामदे में घंटों बैठा बुज़ुर्ग भी सिर्फ़ एक फाइल बनकर रह जाएगा?

क्या दवा के लिए भटकती माँ की आँखों के आँसू भी इसी तरह बेमायने हो जाएँगे?

अगर पंखुड़ियाँ बोल पातीं...

अगर उन गुलाब की पंखुड़ियों को अल्लाह ने ज़ुबान दी होती तो शायद वे रोते हुए कहतीं—

"हम तुम्हारे स्वागत के लिए बिछाई गई थीं।"

"हमारे अंदर उन कर्मचारियों की मोहब्बत थी जिन्होंने हमें अपने हाथों से सजाया था।"

"हमारी खुशबू तुम्हारे सम्मान के लिए थी।"

"लेकिन तुम हमारे ऊपर से गुज़र गए।"

"अब हमें डर है कि कहीं हमारे बाद गरीबों की उम्मीदें भी इसी तरह कुचली न जाएँ।"

बाराबंकी की जनता फूल नहीं, इंसान है

गुलाब की पंखुड़ियाँ तो फिर भी बेज़ुबान थीं।

लेकिन बाराबंकी की जनता बेज़ुबान नहीं है।

वह देखती है।

समझती है।

याद रखती है।

उसे अस्पतालों में दवाएँ चाहिएँ, मशीनें चाहिएँ, डॉक्टर चाहिएँ, इलाज चाहिए।

उसे स्वागत समारोहों से ज़्यादा अस्पतालों में इंसानियत चाहिए।

उसे फूलों की खुशबू से ज़्यादा संवेदनशील प्रशासन की ज़रूरत है।

देवा की सरज़मीं से लेकर महादेवा के धाम तक और अयोध्या के द्वार तक आज एक ख़ामोश सवाल गूंज रहा है—

"जो गुलाब की नाज़ुक पंखुड़ियों में छिपी भावनाओं को न देख सके, क्या वह गरीबों के दर्द को महसूस कर पाएगा?"

यह सवाल किसी एक व्यक्ति से नहीं, पूरे तंत्र से है।

क्योंकि कुचली हुई पंखुड़ियाँ दोबारा नहीं खिलतीं।

और टूटे हुए भरोसे को फिर से महकने में बहुत समय लगता है।

गुलाब की खुशबू तो हवा में बिखर गई, लेकिन उसकी पंखुड़ियों का दर्द आज भी बाराबंकी की फिज़ाओं में तैरता हुआ महसूस किया जा सकता है।


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