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"कर्बला से मिलती है इंसानियत को जीने की राह, नफ़रत को नहीं"— मौलाना मुराद रज़ा, बाराबंकी से पूरी दुनिया को दिया अमन, इंसाफ़ और मोहब्बत का पैग़ाम • आबिद-ए-बीमार (अ.) के मसाएब सुन फूट-फूट कर रोए अज़ादार • 36वीं सालाना मजलिस ग़म, अकीदत और अनुशासन के साथ सम्पन्न


बाराबंकी।मोहर्रम की रूहानी फ़िज़ा में रविवार को असद नगर, दशहरा बाग स्थित अज़ाखाना हाजी सरवर अली रिज़वी में आयोजित 36वीं सालाना मजलिस-ए-अज़ा उस समय भावनाओं के चरम पर पहुँच गई, जब विश्व विख्यात इस्लामिक स्कॉलर एवं पटना (बिहार) से तशरीफ़ लाए मौलाना मुराद रज़ा ने कर्बला के उसूलों को आज के दौर की सबसे बड़ी ज़रूरत बताते हुए कहा कि "इमाम हुसैन (अ.) का पैग़ाम किसी एक कौम या मज़हब के लिए नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत के लिए है। कर्बला इंसाफ़, अमन, सब्र और इज़्ज़त के साथ जीने का नाम है।"

उन्होंने कहा कि दुनिया में बढ़ती नफ़रत, हिंसा, अन्याय और आतंक का मुक़ाबला केवल ताक़त से नहीं, बल्कि कर्बला के उसूलों से किया जा सकता है। अगर इंसान अपने किरदार में सच्चाई, इंसाफ़ और ख़ुदा की बंदगी को जगह दे, तो समाज में अमन और भाईचारे की नई सुबह आएगी।

अपने ख़िताब में मौलाना मुराद रज़ा ने कहा, "जो अल्लाह का हो जाता है, अल्लाह उसका हो जाता है। अपनी ज़िंदगी की लाइफ़ स्टाइल को दीनी बनाइए, क्योंकि असली कामयाबी वही है जो इंसान को अपने रब की रज़ा तक पहुँचा दे। जो ख़ुदा की राह में जीता है, वह मरकर भी ज़िंदा रहता है और लोगों के दिलों पर राज करता है।"

मजलिस उस समय पूरी तरह ग़म में डूब गई, जब मौलाना ने हज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ.) पर ढाए गए ज़ुल्म और कर्बला के बाद अहलेबैत की कैद का दर्दनाक मंजर बयान किया। उन्होंने बताया कि इमाम हुसैन (अ.) और उनके 72 वफ़ादार साथियों की शहादत के बाद यज़ीदी फ़ौज ने ख़ेमों को लूट लिया, महिलाओं और मासूम बच्चों को बेड़ियों और रस्सियों में बाँधकर कूफ़ा और फिर शाम तक ले जाया गया। चार वर्षीय बीबी सकीना (स.अ.) की शहादत का ज़िक्र होते ही मजलिस में सिसकियों की आवाज़ें गूंज उठीं और अज़ादारों की आँखें अश्कबार हो गईं।

मौलाना ने कहा कि दुनिया की झूठी चमक-दमक इंसान को कभी सुकून नहीं दे सकती। जो व्यक्ति केवल दुनियावी ख़ुशियों के पीछे भागता है, वह आख़िरकार ज़िल्लत पाता है, जबकि इमाम हुसैन (अ.) का रास्ता इंसान को इज़्ज़त, सब्र और कामयाबी की मंज़िल तक पहुँचाता है। उन्होंने मोमिनीन से वक़्फ़ की अमानतों और इमाम की जागीरों की हिफ़ाज़त को अपना दीनी फ़र्ज़ बताते हुए उन्हें सुरक्षित रखने की अपील की।

मजलिस का आग़ाज़ ज़मीर अली ने तिलावत-ए-क़ुरआन से किया। ज़मीर अली और हाजी सरवर अली ने शोज़ख़ानी पेश की। इससे पूर्व डॉ. रज़ा मौरानवी, अजमल किंतूरी, डॉ. मुहिब रिज़वी, आरिज़ ज़रगावी, हाजी सरवर अली करबलाई, बाबुल मुराद तथा आबान ने नज़राना-ए-अक़ीदत पेश किया। कार्यक्रम का संचालन अजमल किंतूरी ने किया।

मजलिस के बाद बाराबंकी की प्रसिद्ध अंजुमन गुंचाए अब्बासिया, लखनऊ से आए शुजा अब्बास, अली अब्बास एवं उनके साथियों तथा अंजुमन नुसरतुल अज़ा संगौरा ने दर्दभरी नौहाख़्वानी और सीनाज़नी पेश की। नौहों और मातम की सदाओं से पूरा वातावरण कर्बला की याद में ग़मगीन हो उठा।

इसके बाद अंजुमनों के साथ पारंपरिक जुलूस असद नगर, कृष्णा नगर, हैदरगढ़ रोड, नाका सतरिख सहित तयशुदा मार्गों से गुज़रा। रास्ते भर अज़ादार नौहाख़्वानी और सीनाज़नी करते रहे। जुलूस का समापन अज़ाखाना हाजी सरवर अली करबलाई में अलविदाई मजलिस के साथ हुआ, जहाँ मौलाना इब्ने अब्बास ने ख़िताब किया।

इस पूरी मजलिस के संयोजक वरिष्ठ एवं मान्यता प्राप्त पत्रकार हाजी सरवर अली रिज़वी, कौसर रिज़वी, हसन अब्बास "रोशन" तथा उनके परिवार ने सभी उलेमा, अंजुमनों, मेहमानों और अकीदतमंदों का स्वागत करते हुए आभार व्यक्त किया।

मजलिस का सबसे बड़ा संदेश यही रहा कि कर्बला केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि हर दौर में इंसाफ़, अमन, मानवता और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ डटकर खड़े होने की प्रेरणा देने वाला ऐसा पैग़ाम है, जिसकी ज़रूरत आज पूरी दुनिया को है।

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