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बाराबंकी में अय्याम-ए-अज़ा का आखिरी दिन: जब हर आंख नम थी और हर दिल में था इमाम हसन असकरी (अ.स.) का ग़म

तहलका टुडे टीम/सरवर अली रिज़वी 

बाराबंकी। सुबह की रोशनी अभी पूरी तरह फैली भी नहीं थी। रास्तों पर रोज़ की तरह आवाजाही शुरू हो चुकी थी। दुकानें खुलने लगी थीं और लोग अपने रोज़मर्रा के कामों की तरफ बढ़ रहे थे। लेकिन शहर के कुछ रास्तों पर आज एक अलग ही ख़ामोशी पसरी थी। कहीं काली पोशाक में बैठे लोग आंखें झुकाए हुए थे, कहीं किसी मां की सिसकी सुनाई दे रही थी और कहीं नौहे की धीमी आवाज़ मातम की सदा बनकर दिलों के दरवाज़े पर दस्तक दे रही थी।

यह कोई आम दिन नहीं था।

8 रबीउल अव्वल था—अय्याम-ए-अज़ा का आखिरी दिन।

वह दिन, जब बाराबंकी में इमामबाड़ों, कर्बलाओं और मजलिसगाहों में शहादत-ए-इमाम हसन असकरी (अ.स.) को याद किया गया। सदियां गुजर गईं, लेकिन ग़म की वह कहानी आज भी पुरानी नहीं हुई। सामर्रा की उस दर्दनाक दास्तान का असर ऐसा है कि वक्त गुजरता रहा, पीढ़ियां बदलती रहीं, मगर अहलेबैत (अ.स.) से मोहब्बत रखने वालों के दिलों में वह ग़म आज भी उसी तरह जिंदा है।

मजलिस शुरू हुई तो आवाज़ें थम गईं। निगाहें झुक गईं। दिलों ने अपने दरवाज़े खोल दिए। जब इमाम हसन असकरी (अ.स.) की जिंदगी, उनकी मुश्किलों, तकलीफों और शहादत का ज़िक्र हुआ तो कई आंखें अपने आप छलक उठीं।

मौलाना गुलाम असकरी हॉल में गूंजा ग़म-ए-असकरी

देवा रोड स्थित मौलाना गुलाम असकरी हॉल, बाराबंकी में सुबह 7:45 बजे विशेष मजलिस आयोजित की गई। मजलिस को मौलाना फैज़ अब्बास मशहदी साहब क़िबला ने संबोधित किया।

खिताब के दौरान इमाम हसन असकरी (अ.स.) की जिंदगी, उनकी इल्मी और अखलाकी विरासत तथा शहादत के दर्दनाक पहलुओं पर रोशनी डाली गई। अहलेबैत (अ.स.) के मसाइब का ज़िक्र हुआ तो मजलिस का माहौल ग़मगीन हो उठा।

लोग सुन रहे थे, लेकिन शायद उस वक्त सुनने से ज्यादा महसूस कर रहे थे।

किसी की आंखों में आंसू थे, किसी के हाथ सीने पर थे और किसी की जुबान पर सिर्फ एक ही सदा थी—या इमाम हसन असकरी (अ.स.)।

मजलिस के बाद अंजुमन गुलाम असकरी और अंजुमन गुंचे अब्बासिया के साथ चुप ताज़िए का जुलूस कर्बला सिविल लाइंस की ओर रवाना हुआ। जुलूस में अकीदतमंदों की बड़ी संख्या मौजूद रही और रास्ते भर मातम व नौहाख्वानी की सदाएं गूंजती रहीं।

कर्बला सिविल लाइंस में पुरसा देने उमड़ा हुजूम

कर्बला सिविल लाइंस, बाराबंकी पहुंचने पर इज़्तेमाम-पज़ीर कार्यक्रम हुआ। यहां अलमे मुबारक, शबीह-ए-ताबूत इमाम हसन असकरी (अ.स.) और ताज़िया की ज़ियारत कराई गई।

यहां पहुंचने वाला हर शख्स जैसे अपने साथ कोई दर्द, कोई दुआ और कोई अकीदत लेकर आया था।

अलम के सामने पहुंचकर लोगों ने सिर झुकाए। किसी ने हाथ उठाकर दुआ मांगी, किसी ने आंखें बंद कर लीं और किसी ने खामोशी से अपने दिल का पुरसा पेश किया।

नौहाख्वानी और मातम के दौरान माहौल और भी ग़मगीन हो गया। ऐसा महसूस हुआ मानो वक्त कुछ पलों के लिए ठहर गया हो और सदियों पुराना वह ग़म फिर आंखों के सामने आ खड़ा हुआ हो।

वक्फ कर्बला में याद किए गए इमाम हसन असकरी (अ.स.)

8 रबीउल अव्वल के मौके पर वक्फ कर्बला बेड़ल, बाराबंकी में भी विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। दोपहर करीब 12:30 बजे हुई मजलिस में बड़ी संख्या में अकीदतमंदों ने शिरकत की।

मजलिस के बाद मदीना वापसी के भावपूर्ण दृश्य को प्रतीकात्मक रूप से पेश किया गया। जुलूस में ज़ुलजनाह, अमारी और ताबूत भी शामिल रहे। इन प्रतीकों की ज़ियारत के दौरान अकीदतमंदों की आंखें नम रहीं और माहौल मातमी सदाओं से गूंजता रहा।

यह कार्यक्रम महज एक धार्मिक रस्म नहीं था, बल्कि उस ऐतिहासिक दर्द को याद करने का अवसर था जिसे अहलेबैत (अ.स.) के चाहने वाले सदियों से अपने सीने में संजोए हुए हैं।

कार्यक्रम में सैयद हैदर मौलई की नौहाख्वानी ने माहौल को ग़मगीन कर दिया, जबकि कौसर रज़ा रिज़वी की खिताबत ने अकीदतमंदों को इमाम हसन असकरी (अ.स.) की जिंदगी और शहादत के पहलुओं से रूबरू कराया।

अज़ा सिर्फ मातम नहीं, याद को जिंदा रखने का नाम है

अय्याम-ए-अज़ा का आखिरी दिन गुजर गया। मजलिसें खत्म हो गईं, नौहों की आवाज़ें धीमी पड़ गईं और लोग अपने-अपने घरों की ओर लौट गए।

लेकिन कुछ ग़म ऐसे होते हैं जो कार्यक्रम खत्म होने के साथ खत्म नहीं होते।

इमाम हसन असकरी (अ.स.) की शहादत का ग़म भी ऐसा ही है।

बाराबंकी की गलियों में आज जिन आंखों से आंसू निकले, वे केवल एक तारीख के लिए नहीं थे। वे उस विरासत की याद में थे जिसमें सब्र है, इंसाफ है, इंसानियत है और मुश्किल से मुश्किल दौर में हक पर कायम रहने का पैगाम है।

यही वजह है कि अय्याम-ए-अज़ा खत्म होकर भी खत्म नहीं होते।

मजलिस से लौटते कदमों के साथ नौहे की आवाज़ भले धीमी पड़ जाए, लेकिन दिल में उठी वह सदा देर तक सुनाई देती रहती है—

इमाम हसन असकरी (अ.स.) को पुरसा,
और इमाम-ए-ज़माना (अ.फ.) को पुरसा।

इसी ग़म, अकीदत और मोहब्बत के साथ बाराबंकी में अय्याम-ए-अज़ा का आखिरी दिन संपन्न हुआ। कार्यक्रम के अंत में अकीदतमंदों ने इमाम-ए-ज़माना हज़रत इमाम महदी (अ.फ.) के ज़ुहूर के लिए दुआ की और अहलेबैत (अ.स.) की सीरत पर चलने का संकल्प लिया।


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