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इल्म से अमन तक: मौलाना डॉ. कल्बे रुशैद रिज़वी की पहल से भारत–ईरान के रिश्तों में ऐतिहासिक मोड़


🔴 इल्म से अमन तक: मौलाना डॉ. कल्बे रुशैद रिज़वी बने भारत–ईरान सांस्कृतिक सेतु, ऐतिहासिक MoU से नया अध्याय शुरू


नई दिल्ली | तहलका टुडे विशेष रिपोर्ट/सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा 
जब दुनिया में टकराव, वैचारिक कटुता और सांस्कृतिक दूरी बढ़ती जा रही है, ऐसे दौर में अगर कोई शख़्सियत इल्म को अमन और संवाद को समाधान बना दे, तो वह सिर्फ़ विद्वान नहीं बल्कि ज़माने की ज़रूरत बन जाती है। Maulana Dr. Kalbe Rushaid Rizvi ऐसी ही एक रौशन और असरदार शख़्सियत हैं, जिनकी सोच और संघर्ष ने भारत और ईरान के रिश्तों को एक नई शैक्षणिक-सांस्कृतिक ऊँचाई दी है।

29 दिसंबर 2025: इतिहास में दर्ज हुआ एक सुनहरा दिन

29 दिसंबर 2025 भारत–ईरान संबंधों के इतिहास में एक यादगार तारीख़ बनकर दर्ज हो गई। इस दिन Mewar University और Iran Cultural House के बीच समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हुए।
यह समझौता महज़ दो संस्थानों के बीच औपचारिक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि दो महान सभ्यताओं—भारतीय और ईरानी—के बीच ज्ञान, संस्कृति और इंसानियत के रिश्ते को मज़बूत करने की ऐतिहासिक पहल है।

समझौते के सूत्रधार और दूरदृष्टा

इस ऐतिहासिक MoU को मूर्त रूप देने में मेवाड़ यूनिवर्सिटी के चांसलर अशोक कुमार गड़िया और ईरान कल्चरल हाउस के काउंसलर जनरल फ़रीदुद्दीन फ़रीद की अहम भूमिका रही।
लेकिन इस पूरी प्रक्रिया की वैचारिक आत्मा और नैतिक प्रेरणा मौलाना डॉ. कल्बे रुशैद रिज़वी रहे, जिनकी सोच और मार्गदर्शन ने इस साझेदारी को दिशा दी।

ज्ञान और सद्भाव के लिए समर्पित जीवन

8 फरवरी 1976 को बिहार के मंडरापल्ली में जन्मे मौलाना डॉ. रिज़वी की जीवन-यात्रा इल्म, किरदार और ख़िदमत की मिसाल है।
छह वर्ष की उम्र में लखनऊ के मदरसा-ए-सुल्तानुल मदारिस से इस्लामी शिक्षा की शुरुआत, फिर ईरान के इस्लामिक यूनिवर्सिटी, जम्हूरी इस्लामी में उच्च अध्ययन—यह सफ़र बताता है कि उनके लिए शिक्षा कभी मंज़िल नहीं, बल्कि समाज-सेवा का ज़रिया रही।
उन्हें आयतुल्लाह गुलपैगानी से अमामा और आयतुल्लाह जवाद तब्रैज़ी से इजाज़ा प्राप्त हुआ—जो उनकी विद्वत्ता और भरोसे का प्रतीक है।

अंतरधार्मिक सद्भाव और सामाजिक सरोकार

मौलाना डॉ. रिज़वी ने हमेशा मज़हबों के बीच संवाद और समाजों के बीच सम्मान की बात की।
स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक संतुलन जैसे मुद्दों पर उन्होंने ज़मीनी स्तर पर काम किया—ख़ासकर उन लोगों के लिए, जो समाज के हाशिए पर खड़े हैं।
उनकी इसी भूमिका के कारण वे सेतु-निर्माता के रूप में पहचाने जाते हैं और उनके प्रयासों को यूनेस्को जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी सराहा है।

कैंसर पीड़ितों के लिए उम्मीद की मिसाल

उनका सबसे मार्मिक और मानवीय योगदान हज़ारों कैंसर मरीज़ों के इलाज में सहयोग और जागरूकता अभियान है।
जहाँ इलाज एक सपना बन जाता है, वहाँ मौलाना डॉ. रिज़वी ने उम्मीद बनकर खड़े होने का काम किया—यही कारण है कि असंख्य परिवार उन्हें आज भी दुआओं में याद करते हैं।

युवाओं के मार्गदर्शक

छात्र संसद इंडिया कॉन्क्लेव जैसे मंचों पर युवाओं से संवाद करते हुए उन्होंने हमेशा यह संदेश दिया कि—

“डिग्री हाथ में हो, लेकिन किरदार दिल में होना चाहिए।”

उनकी बातें नौजवानों को नफ़रत से दूर रखकर राष्ट्र-निर्माण, सेवा और संवाद की राह दिखाती हैं।

सम्मान जो ज़िम्मेदारी बन गए

हुसैनी चंद्रक पुरस्कार और फ्रांस की सोरबोन यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट जैसे सम्मान उनकी अंतरराष्ट्रीय पहचान के प्रमाण हैं।
मगर मौलाना डॉ. रिज़वी के लिए हर सम्मान एक सवाल बन जाता है—समाज के लिए अगला क़दम क्या हो?

MoU से खुले नए रास्ते

मेवाड़ यूनिवर्सिटी और ईरान कल्चरल हाउस के बीच हुआ यह समझौता—

  • छात्रों के लिए शैक्षणिक आदान-प्रदान,
  • विद्वानों के लिए संयुक्त शोध,
  • और समाज के लिए सांस्कृतिक समझ के नए द्वार खोलेगा।

यह साझेदारी भारत–ईरान के ऐतिहासिक रिश्तों को आधुनिक शिक्षा और शोध के माध्यम से नई ऊर्जा देगी।

मौलाना डॉ. कल्बे रुशैद रिज़वी की यह पहल साबित करती है कि अगर नीयत साफ़ हो और सोच व्यापक, तो ज्ञान सरहदें लांघ सकता है।
उनकी विरासत यह सिखाती है कि इल्म अगर इंसानियत से जुड़ जाए, तो वह अमन की सबसे बड़ी ताक़त बन जाता है।

“ज्ञान समझ और सद्भाव के दरवाज़े खोलता है—और यही इंसानियत की असली जीत है।”

— तहलका टुडे न्यूज पोर्टल

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