तहलका टुडे टीम/सदाचारी लाला उमेश चंद्र श्रीवास्तव - मोहम्मद वसीक
बाराबंकी:जहाँ आधुनिक अस्पतालों की फ़ाइलों में मरीज “असाध्य” लिखकर लौटा दिए गए…
जहाँ इलाज की लागत ने उम्मीदों को तोड़ दिया…
जहाँ अंधेरा अब स्थायी लगने लगा था—
वहीं श्रीराम वन कुटीर आश्रम, हड़ियाकोल में
इंसानियत ने धर्म, जाति और पहचान से ऊपर उठकर आँखों में रोशनी भर दी।
यह खबर सिर्फ़ एक चिकित्सा शिविर की नहीं,
एक सामाजिक चेतावनी, एक नैतिक सवाल और एक ज़िंदा मिसाल की है।
आँकड़े जो किसी प्रचार के मोहताज नहीं
- 🗓️ शिविर की शुरुआत: 28 दिसंबर 2025
- 📆 स्थिति (02 जनवरी 2026 तक): निरंतर संचालन
- 👁️ कुल सफल मोतियाबिंद ऑपरेशन: 1500 से अधिक
- 🔬 ऑपरेशन तकनीक: अत्याधुनिक IOL (Intra Ocular Lens)
- 🏥 OPD सेवाएँ: प्रतिदिन सैकड़ों मरीज
- 💊 दवा, भोजन, ठहराव: पूर्णतः निःशुल्क
इन आँकड़ों के पीछे
1500 परिवारों की रौशनी, रोज़गार और आत्मसम्मान छिपा है।
डॉक्टरों की वह टीम, जिसने अंधेरे को हराया
इस विशाल सेवा कार्य की रीढ़ बनीं ये चिकित्सकीय टीमें—
🔹 नेत्र शल्य चिकित्सा (ऑपरेशन)
- डॉ. जैकब प्रभाकर (जालंधर, पंजाब)
– जिनकी अनुभवी टीम ने IOL पद्धति से हजारों आँखों में रोशनी लौटाई।
🔹 OPD व परीक्षण
- डॉ. रमेश हुड्डा (रोहतक, हरियाणा)
– जिनकी टीम प्रतिदिन मरीजों की जाँच, चयन और फॉलो-अप कर रही है।
🔹 स्वास्थ्य विभाग की निगरानी
- डॉ. अवधेश यादव — मुख्य चिकित्सा अधिकारी
- डॉ. डी.के. श्रीवास्तव — अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी
- टी.एन. वर्मा — वरिष्ठ नेत्र अधिकारी
- डीपीएम, बाराबंकी — कार्यक्रम समन्वय
- रामअचल जी — निरीक्षण दल
इन सबके सामूहिक प्रयास ने इस शिविर को
एक मॉडल हेल्थ कैंप बना दिया।
दो मुस्लिम आँखें, जो पूरे समाज से सवाल पूछ रही हैं
इसी शिविर में
दो ऐसे मुस्लिम मरीज,
जिन्हें देश के विभिन्न अस्पतालों ने
“जोखिम भरा” कहकर लौटा दिया था—
यहाँ उनसे
न नाम पूछा गया,
न धर्म,
न पहचान।
ऑपरेशन हुआ।
पट्टी खुली।
रोशनी लौट आई।
आज ये दो मामले पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय हैं,
क्योंकि इन्होंने साबित किया—
इलाज का कोई मज़हब नहीं होता।
दर्द सिर्फ़ इंसान का होता है।
जय श्रीराम आश्रम के बीच दुआओं की ख़ामोश आवाज़
अस्पताल परिसर में
“जय श्रीराम” के जयकारे गूंजते हैं—
और उन्हीं गलियारों में
ख़ामोश दुआएँ भी उठती हैं।
यहाँ न आस्थाएँ टकराती हैं,
न पहचानें भिड़ती हैं—
यहाँ सिर्फ़ पीड़ा उतरती है।
सेवादार, जो कैमरों से दूर रहे
- मरीजों को भोजन
- तीमारदारों की देखभाल
- दवा वितरण
- साफ़-सफ़ाई
- व्यवस्था संचालन
यह सब बिना किसी प्रचार के
सेवादारों द्वारा किया जा रहा है।
राजस्थान के बीकानेर से आई रसोई टीम
दिन-रात सेवा में लगी है—
ताकि कोई भूखा न रहे।
नेता क्यों नहीं दिखे? सवाल तेज़ हो रहे हैं
इतनी बड़ी सेवा के बावजूद
जन प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति
अब चर्चा का विषय बन चुकी है।
स्थानीय लोगों का सवाल है—
- क्या यहाँ फीता काटने का मौका नहीं?
- क्या यहाँ पोस्टर नहीं लगते?
- या फिर यहाँ आकर सिर्फ़ इंसान बनना पड़ता है, नेता नहीं?
क्या सांझी विरासत सिर्फ़ मंचों तक सीमित है?
गंगा-जमुनी तहज़ीब की बातें
मुशायरों में खूब होती हैं—
लेकिन जब वही तहज़ीब
ऑपरेशन टेबल पर ज़िंदा दिखती है,
तो सियासत की चुप्पी क्यों?
यह सवाल अब सिर्फ़ आश्रम का नहीं—
पूरे समाज का है।
सेवा ही सबसे बड़ा धर्म
श्रीराम वन कुटीर आश्रम ने यह साबित कर दिया कि—
जहाँ सेवा है,
वहीं राम है…
वहीं रहमान है।
1500 ऑपरेशन,
दर्जनों डॉक्टर,
सैकड़ों सेवादार
और हज़ारों दुआएँ—
यह खबर सिर्फ़ पढ़ने के लिए नहीं,
सोचने के लिए है।
0 Comments