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अभी रास्ते खुले हैं सब... अभी हर बात मुमकिन है,49वें अखिल भारतीय कवि सम्मेलन एवं मुशायरे में गीत, ग़ज़ल और शायरी ने सजाई यादगार रात,कौमी एकता, मोहब्बत और सामाजिक सरोकारों के संदेश से देर रात तक गूंजता रहा गांधी भवन


तहलका टुडे टीम

बाराबंकी।कुछ रातें सिर्फ रातें नहीं होतीं, वे शहर की याददाश्त में दर्ज हो जाती हैं। देवा रोड स्थित गांधी भवन में शुक्रवार की रात भी ऐसी ही एक शाम थी, जहां शब्दों ने उम्मीद जगाई, शेरों ने रिश्तों की नजाकत छुई और गीतों ने कौमी एकता की वह तस्वीर सामने रखी जिसमें हिंदू-मुस्लिम एकता किसी नारे की तरह नहीं, बल्कि जिंदगी की सहज सच्चाई बनकर उभरी।

गांधी जयंती समारोह के ऐतिहासिक 49वें अखिल भारतीय कवि सम्मेलन एवं मुशायरे में देश के विभिन्न हिस्सों से आए कवियों और शायरों ने अपनी रचनाओं से देर रात तक श्रोताओं को बांधे रखा। कभी सभागार तालियों से गूंजा तो कभी किसी शेर पर वाह-वाह की आवाजें देर तक सुनाई देती रहीं।

काव्य संध्या की शुरुआत ही उम्मीद के उस स्वर से हुई जिसने पूरी महफिल का मिजाज तय कर दिया—

“अभी रास्ते खुले हैं सब, अभी हर बात मुमकिन है,
हुई देरी नहीं ज्यादा, अभी भी साथ मुमकिन है...”

लोकेश त्रिपाठी की इन पंक्तियों ने जैसे शाम को अपना शीर्षक दे दिया।

कार्यक्रम का संचालन मशहूर शायर फैज खुमार बाराबंकवी ने किया, जबकि अध्यक्षता वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अमीर हैदर ने की। भोपाल से आए डॉ. अंजुम बाराबंकवी ने अपनी ग़ज़ल के अंदाज़ में कहा—

“पानी से दुश्मनी है तो कश्ती में क्यों रहें,
दरिया की तह में हमको उतर जाना चाहिए...”

श्रोताओं ने तालियों के साथ उनका स्वागत किया।

लखनऊ के असद उमर ‘असद’ ने बदलते वक्त और रिश्तों की दूरी को अपने शेरों में उतारा—

“याराने रफ्तगां तो बहुत दूर जा चुके,
जो है करीब वह भी कहां दस्तरस में है।”

वहीं फैज खुमार बाराबंकवी के शेर—

“मौसम ने की जो उसकी अदाओं से छेड़छाड़,
फैला के उसने जुल्फों का बादल बना दिया।”

पर भी खूब दाद मिली।

लतीफ बाराबंकवी ने अपनी ग़ज़लों से महफिल को और रंगीन किया। जमुना प्रसाद उपाध्याय ने व्यंग्य के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों पर चोट की, जबकि जागेश्वर रावत ने राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत रचना सुनाकर माहौल में देशप्रेम का रंग भर दिया।

कवि अशोक टाटम्बरी ने कौमी एकता को अपनी पंक्तियों में कुछ इस तरह पिरोया—

“आजाद संग हमीद तो समझो बसंत है,
होली में मिले ईद तो समझो बसंत है।”

इन पंक्तियों के साथ गांधी भवन तालियों से गूंज उठा।

कार्यक्रम का शुभारंभ पूर्व कैबिनेट मंत्री अरविंद कुमार सिंह ‘गोप’ ने किया। इस अवसर पर राजनाथ शर्मा, ताज बाबा राईन, मो. फैसल, अनवर महबूब किदवई, नईम सिद्दीकी, शिवशंकर शुक्ला, मो. अहमद शहंशाह, तालिब नजीब कोकब, असद मदनी, हशमत उल्ला, तारिक जिलानी, तौकीर कर्रार, इंदिरा शर्मा, अशोक शुक्ला, सरिता शर्मा, अदिति शर्मा, धनंजय शर्मा, सत्यवान वर्मा, सोनू यादव, सभासद शिवा शर्मा, आफाक अली और फारूख अयूब एडवोकेट समेत बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी मौजूद रहे।

गांधी भवन की यह शाम इस मायने में भी खास रही कि यहां कविता और शायरी महज मनोरंजन नहीं रही, बल्कि मोहब्बत, इंसानियत, सामाजिक जिम्मेदारी और आपसी भाईचारे का संदेश बनकर सामने आई।

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