बाराबंकी।कभी-कभी अदालत की तारीख सिर्फ तारीख नहीं होती। किसी के लिए वह वर्षों से ढोए जा रहे दर्द का आख़िरी पड़ाव होती है, किसी के लिए कर्ज़ की चिंता से मुक्ति का रास्ता और किसी के लिए उस रिश्ते को बचा लेने की आख़िरी कोशिश, जिसे ग़ुस्से, गलतफहमियों और दूरियों ने अदालत की चौखट तक ला खड़ा किया हो।
बाराबंकी की अदालत में 12 सितंबर की सुबह भी कुछ ऐसी ही उम्मीदें लेकर आई थी।
अदालत परिसर में लोग थे, फाइलें थीं, कागज़ थे और अपने-अपने विवादों का बोझ था। लेकिन इस बार वातावरण में एक अलग ही भरोसा था। यहां कोशिश यह नहीं थी कि कौन जीते और कौन हारे—कोशिश यह थी कि विवाद हार जाए और इंसान जीत जाए।
यही राष्ट्रीय लोक अदालत की असली तस्वीर थी।
राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, लखनऊ के निर्देश पर प्रशासनिक न्यायमूर्ति, बाराबंकी श्री सुभाष विद्यार्थी की अध्यक्षता तथा जनपद न्यायाधीश/अध्यक्ष, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, बाराबंकी श्रीमती प्रतिमा श्रीवास्तव की उपस्थिति में आयोजित राष्ट्रीय लोक अदालत ने एक ही दिन में हजारों लोगों को राहत की वह उम्मीद दी, जिसके लिए वे लंबे समय से न्यायालयों की चौखट पर आते-जाते रहे थे।
मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्ज्वलन के साथ जब लोक अदालत का शुभारंभ हुआ तो शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि दिन ढलते-ढलते आंकड़ों के पीछे इतनी सारी मानवीय कहानियां जुड़ जाएंगी।
कार्यक्रम में प्रशासनिक न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी, जनपद न्यायाधीश प्रतिमा श्रीवास्तव, पीठासीन अधिकारी मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण श्रीमती अल्पना सक्सेना तथा श्रीमती वन्दना सिंह प्रथम ने दीप प्रज्ज्वलित कर शुभारंभ किया।
इस अवसर पर जिलाधिकारी बाराबंकी श्री ईशान प्रताप सिंह, पुलिस अधीक्षक श्री अर्पित विजयवर्गीय, जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष श्री रमन लाल द्विवेदी, पूर्व अध्यक्ष श्री नरेन्द्र वर्मा, महामंत्री श्री प्रदीप श्रीवास्तव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव श्री उज्ज्वल उपाध्याय, अग्रणी जिला प्रबंधक बैंक ऑफ इंडिया श्री सौरभ मौर्या सहित न्यायिक अधिकारी, अधिवक्ता, कर्मचारी और पत्रकार उपस्थित रहे।
सुभाष विद्यार्थी ने न्याय को समझौते की रोशनी दिखाई
प्रशासनिक न्यायमूर्ति श्री सुभाष विद्यार्थी ने अपने उद्बोधन में लोक अदालत को न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण और प्रभावी माध्यम बताते हुए कहा कि यहां पक्षकारों को आपसी सहमति और समझौते के आधार पर शीघ्र, सरल और सुलभ न्याय मिलता है।
उनके शब्दों में लोक अदालत की सबसे बड़ी खूबसूरती यही थी कि यहां फैसला थोपने के बजाय सहमति से समाधान का रास्ता निकाला जाता है।
उन्होंने कहा कि लोक अदालत का उद्देश्य केवल लंबित वादों का निस्तारण करना नहीं, बल्कि पक्षकारों के बीच सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाकर विवादों का स्थायी समाधान सुनिश्चित करना भी है। अदालतों में लंबित मामलों के शीघ्र निस्तारण में लोक अदालतों की भूमिका महत्वपूर्ण है। इससे पक्षकारों का समय और धन बचता है और उन्हें लंबे समय तक न्यायिक प्रक्रिया में उलझे रहने से राहत मिलती है।
सुभाष विद्यार्थी की यह सोच अदालत की पारंपरिक तस्वीर से आगे जाती दिखाई दी—न्याय केवल फैसला सुनाने का नाम नहीं, बल्कि जहां संभव हो वहां दोनों पक्षों को संतोष देकर घर भेजने का नाम भी है।
प्रतिमा श्रीवास्तव की पहल में दिखी आम आदमी के न्याय की चिंता
जनपद न्यायाधीश श्रीमती प्रतिमा श्रीवास्तव ने आमजन से अपील की कि वे अपने लंबित और प्री-लिटिगेशन विवादों को आपसी सहमति एवं समझौते के माध्यम से निस्तारित कराने के लिए लोक अदालत का अधिक से अधिक लाभ उठाएं।
उनकी बात में अदालत से बाहर खड़े उस आम आदमी की चिंता साफ दिखाई दी, जिसके लिए मुकदमा सिर्फ कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि समय, पैसा और मानसिक तनाव का लंबा सफर होता है।
उन्होंने कहा कि विधिक सेवा प्राधिकरण का प्रमुख उद्देश्य समाज के प्रत्येक वर्ग, विशेषकर कमजोर और जरूरतमंद लोगों तक न्याय की पहुंच सुनिश्चित करना है।
सुभाष विद्यार्थी और प्रतिमा श्रीवास्तव की अगुवाई में लोक अदालत की यह तस्वीर इसलिए भी उल्लेखनीय रही कि इसमें कानून के साथ संवेदना और न्याय के साथ इंसानियत को बराबर जगह मिली।
1 लाख 74 हजार 175 मामले—एक दिन में हजारों चेहरों पर राहत
जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव श्री उज्ज्वल उपाध्याय के अनुसार राजस्व, बैंकों, विभिन्न विभागों तथा सिविल कोर्ट बाराबंकी के समस्त न्यायालयों द्वारा समग्र रूप से 1,74,175 मामलों का निस्तारण किया गया।
इन मामलों में कुल 27,76,66,488 रुपये अर्थदंड एवं प्रतिकर के रूप में जमा कराया गया।
सिविल कोर्ट बाराबंकी के विभिन्न न्यायालयों ने 33,796 वादों का निस्तारण किया और कुल 8,13,58,890 रुपये अर्थदंड एवं प्रतिकर के रूप में वसूल किए गए।
मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण न्यायालय ने भी मामलों का निस्तारण करते हुए पीड़ित पक्षकारों को प्रतिकर उपलब्ध कराया। वहीं प्रधान न्यायाधीश पारिवारिक न्यायालय सहित सभी पारिवारिक न्यायालयों द्वारा 273 मामलों का निस्तारण किया गया।
इससे पहले 9 से 11 सितंबर 2026 तक आयोजित लघु वादों की विशेष लोक अदालत में भी 1,264 वादों का निस्तारण किया गया।
अदालत के दरवाजे तक आने से पहले ही 1,40,379 विवादों को मिली राह
लोक अदालत की सबसे बड़ी उपलब्धियों में प्री-लिटिगेशन मामलों का निस्तारण भी रहा।
वैवाहिक, राजस्व, बैंक और विभिन्न विभागों से संबंधित 1,40,379 मामलों का निस्तारण प्री-लिटिगेशन स्तर पर किया गया और कुल 19,63,07,598 रुपये की धनराशि वसूल की गई।
जिले के विभिन्न राजस्व न्यायालयों से 77,057 वादों का निस्तारण हुआ।
विभिन्न बैंकों ने 2,198 एनपीए खातों का निस्तारण करते हुए 14,16,40,462 रुपये वसूल किए। इनमें बैंक ऑफ इंडिया ने सर्वाधिक 924 मामलों का निस्तारण किया।
आंकड़े बड़े हैं, लेकिन इनके पीछे राहत पाने वाले चेहरों की संख्या उससे कहीं बड़ी है।
फिर आई वह घड़ी, जब अदालत में तालियों से ज्यादा आंखें बोल रही थीं
और फिर लोक अदालत का वह दृश्य आया, जिसे किसी सरकारी रिपोर्ट के आंकड़ों में पूरी तरह दर्ज नहीं किया जा सकता।
पारिवारिक न्यायालयों द्वारा 11 जोड़ों को एक साथ विदा किया गया।
कुछ समय पहले तक जिन रिश्तों के बीच शिकायतें थीं, दूरियां थीं और अदालत तक पहुंचने की मजबूरी थी, उसी दिन वे रिश्ते फिर साथ चल पड़े।
प्रशासनिक न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी, जनपद न्यायाधीश प्रतिमा श्रीवास्तव, पीठासीन अधिकारी अल्पना सक्सेना, श्रीमती वन्दना सिंह प्रथम और अन्य न्यायिक अधिकारियों ने इन जोड़ों को माला पहनाकर विदा किया। मिठाई बांटी गई।
और जब बच्चों को चॉकलेट मिलीं तो शायद उन्हें यह मालूम भी नहीं था कि उनके हाथ में आई वह छोटी-सी मिठास किसी बड़े पारिवारिक फैसले की निशानी है।
यहां अदालत ने किसी को दोषी नहीं ठहराया था।
यहां किसी की जीत और किसी की हार नहीं हुई थी।
यहां एक परिवार को फिर से घर जाने का रास्ता मिला था।
जहां पानी और बिस्किट भी न्याय व्यवस्था की संवेदना बन गए
अन्य वादकारियों के लिए पानी और बिस्किट की व्यवस्था की गई। उनके साथ आए बच्चों को चॉकलेट दी गई।
जिला विधिक सेवा प्राधिकरण ने लोगों की सुविधा के लिए जिला कारागार, वृद्धाश्रम और डाक विभाग के स्टॉल लगाए। चिकित्सा विभाग की ओर से स्वास्थ्य परीक्षण शिविर लगाया गया। वादकारियों को सही स्थान तक पहुंचाने के लिए दो हेल्प डेस्क बनाए गए और स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था की गई।
पराविधिक स्वयं सेवकों ने भी आमजन की सहायता की।
इन छोटी-छोटी व्यवस्थाओं में एक बड़ी बात छिपी थी—न्यायालय तक पहुंचने वाला व्यक्ति सिर्फ एक वादकारी नहीं, एक इंसान है; उसकी परेशानी भी व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
लोक अदालत का मतलब—विवाद से आगे बढ़कर जीवन को देखना
बाराबंकी की इस राष्ट्रीय लोक अदालत की कहानी को अगर केवल आंकड़ों में लिखा जाए तो यह 1,74,175 मामलों के निस्तारण की कहानी है।
लेकिन अगर इसे उन लोगों की आंखों से पढ़ा जाए जो उस दिन अदालत से लौटे, तो यह राहत, समझौते, उम्मीद और रिश्तों की वापसी की कहानी है।
सुभाष विद्यार्थी ने न्याय को सरल और सुलभ बनाने का संदेश दिया तो प्रतिमा श्रीवास्तव ने आमजन को समझौते के रास्ते से विवाद समाप्त करने का भरोसा दिया। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव उज्ज्वल उपाध्याय और उनकी टीम ने व्यवस्थाओं को जमीन पर उतारकर इस प्रयास को आकार दिया।
शायद इसी वजह से बाराबंकी की यह लोक अदालत सिर्फ अदालत की एक तारीख बनकर नहीं रह गई।
उस दिन कई लोगों के लिए मुकदमा खत्म हुआ, कई परिवारों के लिए इंतजार खत्म हुआ और 11 घरों में शायद बरसों बाद फिर से साथ लौटने की शुरुआत हुई।
कानून की किताबें अपनी जगह हैं, अदालत की मर्यादा अपनी जगह है—लेकिन जब न्याय के साथ इंसान का दिल भी दिखाई देने लगे, तो अदालत सिर्फ फैसला सुनाने की जगह नहीं रहती।
वह उम्मीद का घर बन जाती है।
0 Comments